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हाईकोर्ट का अहम फैसला : 30 साल की सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कर्मचारी का अधिकार, सरकार की याचिका खारिज

Thu, 18 Jul 2024 03:49 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 18 Jul 2024 03:49 PM IST
सार

कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका की खारिज कर दी। साथ ही प्रशासनिक न्यायाधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें डॉ. सिंह के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति अनुरोध को अस्वीकार करने के केंद्र सरकार के 31 मार्च, 2014 और 6 मई, 2014 के आदेशों को रद्द कर दिया गया था।

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Important decision of the High Court: Employee's right to voluntary retirement after 30 years of service
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 30 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद एक सरकारी कर्मचारी को केंद्रीय सिविल सेवा नियम-1972 के अंतर्गत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का अधिकार है, बशर्ते वो निलंबित न हुआ हो। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति विकास खंडपीठ ने बस्ती जिले के डाकघर अधीक्षक डॉ. शिव पूजन आर सिंह की याचिका पर सुनाया हैं। केंद्र सरकार की ओर से डॉ. शिव पूजन सिंह की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को जायज ठहराने वाले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के फैसले को चुनौती दी गई थी।

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कोर्ट ने केंद्र सरकार की याचिका की खारिज कर दी। साथ ही प्रशासनिक न्यायाधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें डॉ. सिंह के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति अनुरोध को अस्वीकार करने के केंद्र सरकार के 31 मार्च, 2014 और 6 मई, 2014 के आदेशों को रद्द कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सीसीसी (पेंशन नियम), 1972 के नियम 48 के तहत, एक सरकारी कर्मचारी को 30 वर्ष की सेवा पूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का अधिकार है, बशर्ते कि वे निलंबित न हों।

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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम-48 सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी को 2 शर्तों के अधीन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का दावा करने का अधिकार देता है। पहला 30 वर्ष की संतोषजनक सेवा पूरी करना और दूसरा यह कि कर्मचारी का निलंबन के अधीन न होना। न्यायालय ने कहा कि नियोक्ता का विवेकाधिकार नियम 48 ए (जो 20 वर्ष की सेवा से संबंधित है) के तहत लागू होता है, लेकिन नियम-48 के तहत सेवानिवृत्ति के प्रभावी होने के लिए नियोक्ता की स्वीकृति आवश्यक नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों प्रावधानों के बीच एक स्पष्ट अंतर है। हाईकोर्ट ने पाया कि डॉ. सिंह के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की प्रभावी तिथि के बाद की गई थी, जो उनके सेवानिवृत्ति अनुरोध के लिए अप्रासंगिक है। न्यायालय ने कहा, विभागीय आरोप पत्र स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की प्रभावी तिथि के बहुत बाद 10 अक्टूबर 2013 को जारी किया गया है जो अप्रासंगिक है।

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