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इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: दुष्कर्म पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, मां..
Wed, 12 Jul 2023 08:59 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 12 Jul 2023 08:59 AM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता द्वारा बच्चे को जन्म देने के मामले में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। मामले में जेएन मेडिकल कालेज अलीगढ़ में पीड़िता की जांच कराकर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
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allahabad high court
- फोटो : social media
विस्तार
बुलंदशहर जनपद की 12 साल की दिव्यांग दुष्कर्म पीड़िता द्वारा अपनी 25 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यौन उत्पीड़न करने वाले पुरुष के बच्चे को जन्म देने के लिए किसी महिला को मजबूर नहीं किया जा सकता है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने दुष्कर्म पीड़िता की मां की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दी है। मामले में बुधवार को सुनवाई होगी।
कोर्ट ने कहा कि किसी महिला के गर्भ के चिकित्सकीय समापन से इनकार करने और उसे मातृत्व की जिम्मेदारी से बांधने के अधिकार से इन्कार करना उसके सम्मान के साथ जीने के मानव अधिकार से इन्कार करना होगा। उसे अपने शरीर के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। वह मां बनने के लिए हां या ना कह सकती है।
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कोर्ट ने मामले की संवदेनशीलता को देखते हुए मानवीय आधार पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति से जवाहर लाल मेडिकल कॉलेज अलीगढ़ के प्राचार्य को प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की अध्यक्षता में पांच चिकित्सकों की टीम गठित कर पीड़िता की मेडिकल जांच कराने का निर्देश दिया है।
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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने दुष्कर्म पीड़िता की मां की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दी है। मामले में बुधवार को सुनवाई होगी।
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कोर्ट ने कहा कि किसी महिला के गर्भ के चिकित्सकीय समापन से इनकार करने और उसे मातृत्व की जिम्मेदारी से बांधने के अधिकार से इन्कार करना उसके सम्मान के साथ जीने के मानव अधिकार से इन्कार करना होगा। उसे अपने शरीर के संबंध में निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। वह मां बनने के लिए हां या ना कह सकती है।
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कोर्ट ने मामले की संवदेनशीलता को देखते हुए मानवीय आधार पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति से जवाहर लाल मेडिकल कॉलेज अलीगढ़ के प्राचार्य को प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की अध्यक्षता में पांच चिकित्सकों की टीम गठित कर पीड़िता की मेडिकल जांच कराने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने कहा है कि जांच कर 12 जुलाई को मेडिकल रिपोर्ट उसके समक्ष पेश की जाए। कोर्ट ने कहा है कि टीम में एनेस्थेटिस्ट, रेडियो डॉयग्नोसिस विभाग के एक-एक सदस्यों को भी शामिल करने को कहा है। याची की ओर से कहा गया कि दुष्कर्म पीड़िता बोलने और सुनने में असमर्थ है।
वह अपनी आप बीती किसी को नहीं बता सकती है। एक परिचित ने उसका कई बार यौन उत्पीड़न किया। उसने अपने साथ हुए उत्पीड़न की जानकारी अपनी मां को संकेतों के जरिये दी। इसके बाद मां की शिकायत पर आरोपी के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई। 16 जून को पीड़िता की मेडिकल जांच कराई गई तो उसे 23 सप्ताह का गर्भ था।
27 जून को मामले को मेडिकल बोर्ड के समक्ष रखा गया तो यह राय दी गई कि क्योंकि गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक है। लिहाजा, गर्भपात कराने से पहले अदालत के आदेश की अनुमति की आवश्यकता है। इसलिए वह हाईकोर्ट पहुंची।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम की धारा तीन के अनुसार किसी महिला के गर्भ को समाप्त करने का समय 24 सप्ताह तक ही है। केवल विशेष श्रेणियों में अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने याची की परिस्थितियों को देखते हुए मेडिकल रिपोर्ट तलब की है।