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संशय में डूबे ‘प्रभु’ की रेल के कर्मचारी

Tue, 09 Dec 2014 12:06 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Tue, 09 Dec 2014 12:06 AM IST
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Immersed in doubt Lord railway employee
मोदी सरकार में रेलवे बोर्ड को खत्म करने की चर्चा क्या उठी रेलवे कर्मचारी संशय और उहापोह में पहुंच गए। बोर्ड से पिछले दिनों जारी एक चिट्ठी ने आग में घी डाल दिया है। इस पत्र में केंद्रीय रेल विद्युतीकरण संगठन समेत उत्पादन इकाइयों से उनकी स्थापना का उद्देश्य, कुल अफसरों और कर्मचारियों की संख्या और कार्य के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी गई है। मोदी सरकार ने जिन उत्पादन इकाइयों से जुड़ी परियोजनाओं को पीपीपी मोड में डालने का नोट जारी किया है, उसके कर्मचारियों में डर है कि सरकार अगला कदम क्या उठाएगी। सभी भविष्य को लेकर परेशान हैं।
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रेलवे में 100 फीसदी एफडीआई के साथ ही रेलवे ने 19 ऐसे कार्य चिह्नित किए हैं जिनमें मार्केट से रेलवे धन का इंतजाम करेगा। रेलवे बोर्ड में चेयरमैन के बजाए सीईओ प्रणाली अपनाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। साथ ही रेलवे की वित्तीय हालत सुधारने के तौर-तरीके बताने के लिए मंत्रालय ने उच्च स्तरीय कमेटी भी गठित कर दी। इसमें इरकॉन, आरएलडीए, कॉनकोर के एमडी, वित्त सलाहकार को भी रखा गया है। कमेटी 21 दिसंबर को रिपोर्ट देगी। रिपोर्ट मिलने के पहले ही मंत्रालय ने सभी इलाहाबाद स्थित केंद्रीय रेल विद्युतीकरण संगठन समेत सभी उत्पादन इकाइयों को पत्र भेजकर उनकी स्थापना का वर्ष, स्थापना का उद्देश्य, तैनात अफसरों और कर्मचारियों की संख्या, जिस कार्य के लिए इकाई को स्थापित किया गया है, वह लक्ष्य पूरा है या नहीं, जैसे सवालों के जवाब पूछे गए हैं। चर्चा है कि रेल कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु में भी कमी हो सकती है।
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ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों में कई सवाल उभर रहे हैं। सभी को डर है कि कई उत्पादन इकाइयों का काम निजी हाथों में देकर अफसरों-कर्मचारियों की संख्या सीमित की जा सकती है। रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने यह साफ किया कि निजीकरण नहीं किया जाएगा लेकिन एआईआरएफ के महामंत्री शिव गोपाल मिश्रा का कहना है कि मोदी सरकार ज्यादातर कार्य निजी कंपनियों और एजेंसियों को देकर रेलवे को कमजोर करना चाहती है। इसके खिलाफ आंदोलन तय है।
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