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अवैध गिरफ्तारी पर मिलेगा 25 हजार रुपये मुआवजा और दोषी अफसर को सजा

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 11 Jun 2021 08:46 PM IST

सार

  • अवैध निरुद्धि के मामले में सरकार की नई नीति की हाईकोर्ट ने की सराहना
  • दोषी अधिकारी के खिलाफ तीन माह में पूरी की जाएगी जांच
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय
चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय - फोटो : file photo

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विस्तार

किसी व्यक्ति को अवैध तरीके से गिरफ्तार कर निरुद्धि में रखने पर पीड़ित को सरकार 25 हजार रुपये मुआवजा देगी। साथ ही अवैध रूप से निरुद्ध करने वाले अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच कर कार्रवाई भी की जाएगी। हाईकोर्ट के निर्देश पर बनी इस मुआवजा नीति की कोर्ट ने सराहना की है। कोर्ट ने 23 मार्च 2021 से लागू इस नई नीति का कड़ाई से पालन करने का मुख्य सचिव और अपर मुख्य सचिव गृह को निर्देश दिया है। 
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प्रदेश सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि सरकार की इस नई नीति के तहत आम लोगों के जीवन के  मूल अधिकार का हनन करने वाले दोषी अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई होगी। उत्पीड़न व अवैध निरूद्धि की शिकायत की जांच तीन माह में पूरी की जाएगी और अवैध निरूद्धि सिद्ध होने पर पीड़ित को 25 हजार रुपये का तत्काल मुआवजा मिलेगा। 


कोर्ट ने कहा है कि इस नीति को प्रदेश के सभी ब्लाकों, तहसील मुख्यालयों, जिला कलेक्ट्रेट व पुलिस थानों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाए, डिस्प्ले बोर्ड पर लगाया जाए और अखबारों में प्रकाशित किया जाए। आदेश की प्रति सभी तहसील व जिला बार एसोसिएशन को भेजी जाए, ताकि आम लोगों को इसकी जानकारी हो सके। 

वाराणसी के रोहनिया के शिवकुमार वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने कहा है कि सरकारी सेवक आम लोगों का भी सेवक है। इसलिए उसे पद के दायरे में रहते हुए ही अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए। उत्पीड़नात्मक कार्रवाई दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी भी अधिकारी द्वारा शक्ति का दुरुपयोग करने पर उसे किसी कानून में संरक्षण नहीं मिला है। 

मुआवजे की राशि दोषी अफसरों से वसूल करें

कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों द्वारा आम लोगों का उत्पीड़न किया जाना न केवल उस व्यक्ति की क्षति है, वरन असहाय की मनोदशा को चोट पहुंचाने वाली सामाजिक क्षति है। ऐसे में पीड़ित को मुआवजा दिलाना सामाजिक बुराई को हतोत्साहित करना भी है। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों को राजनीतिक संरक्षण नहीं है, आर्थिक रूप से सबल नहीं है ,वे नौकरशाही की मनमानी कार्रवाई का मुकाबला नहीं कर सकते। इससे उनका सिस्टम से भरोसा उठने लगता है और निराशा पनपने लगती है। इसलिए विवेकाधिकार का मनमाना प्रयोग करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई के साथ पीड़ित को मुआवजा पाने का अधिकार है। सरकार ऐसी राशि की वसूली दोषी अधिकारियों से अवश्य करे।

क्या था मामला

याची शिवकुमार का जमीन बंटवारे को लेकर पारिवारिक विवाद था। परिवार के सदस्यों के बीच झगड़े की स्थिति को देखते हुए पुलिस ने धारा 151 में चालान किया। आठ अक्तूबर 20 को दरोगा ने प्रिंटेड फॉर्म पर नाम भरकर रिपोर्ट भेजी, जिसपर एसडीएम ने केस दर्ज कराया। याची ने 12 अक्तूबर 20 को बंधपत्र दिया, किंतु उसे रिहा नहीं किया गया। खतौनी के सत्यापन की तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी। 21 अक्तूबर को पेश करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट आने पर याची रिहा किया गया। यह याचिका दायर कर याची ने 12 अक्तूबर से 21 अक्तूबर 20 तक अवैध निरुद्धि के मुआवजे की मांग की।

कोर्ट के निर्देश पर डीजीपी ने सभी पुलिस अधिकारियों को परिपत्र जारी किया और कहा कि चालान प्रिंटेड प्रोफार्मा पर नहीं होगा और पूर्ण विवरण, पत्रजात के साथ चालान रिपोर्ट भेजी जाए। मुआवजे के मुद्दे पर सरकार ने नीति जारी कर कोर्ट में पेश की। जिसपर कोर्ट ने यह आदेश दिया है और कहा है कि मुआवजे की नीति आने के बाद याची के लिए अलग से आदेश देने की आवश्यकता नहीं है।

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