सिर्फ सलाहकार नहीं है मानवाधिकार आयोग: हाईकोर्ट
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प्रदेश सरकार ने मानवाधिकार आयोग के 28 अप्रैल 2015 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में आयोग ने जेल में मृत बंदी के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का सरकार को निर्देश दिया था। यह भी कहा था कि राशि प्रदान करने की सूचना सरकार आयोग को दे। सरकार ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग सिर्फ संस्तुति कर सकता है। सरकार उसकी संस्तुतियों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। आयोग को अपने निर्देशों के अनुपालन की जानकारी मांगने का भी अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील को खारिज करते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग का गठन संवैधानिक व्यवस्था के तहत किया गया है। इसको संस्तुतियां करने का अधिकार है, सरकार इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसा करने से संस्था के गठन का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। आयोग के प्रावधानों के अनुसार उसे सरकार से जानकारी मांगने का भी अधिकार है। मानवाधिकार आयोग के पास भी विकल्प मौजूद है कि अपने निर्देशों के अनुपालन हेतु हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट जा सकता है। न्यायिक समीक्षा का विकल्प मौजूद है।
प्रकरण के अनुसार मुजफ्फनगर जिला कारागार में बंद विचाराधीन कैदी ओमेंद्र की 21 सितंबर 2014 को मृत्यु हो गई। आयोग द्वारा की गई जांच में पता चला कि बंदी वर्ष 2011 से निरुद्ध था। उसे अस्थमा की बीमारी थी मगर जेल में जाने के बाद उसका कोई इलाज नहीं कराया गया। हालत बिगड़ने पर पहले जेल अस्पताल में इलाज किया फिर जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। आयोग ने मानवाधिकार हनन का मामला मानते हुए मुआवजा देने का निर्देश दिया था।