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सिर्फ सलाहकार नहीं है मानवाधिकार आयोग: हाईकोर्ट

Wed, 27 Apr 2016 12:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Wed, 27 Apr 2016 12:28 AM IST
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Human Rights Commission is not only advisory : High Court
लाोक अदालत
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि मानवाधिकार आयोग मात्र सलाहकार या सिफारिश करने वाली संस्था नहीं है। आयोग का गठन संवैधानिक व्यवस्था के तहत हुआ है। इसकी सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार बाध्य है। यदि आयोग के निर्देशों से सरकार को मतभेद है तो उसके पास हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट जाने का विकल्प मौजूद है। प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायमूर्ति डा. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने यह निरीक्षण किया।
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प्रदेश सरकार ने मानवाधिकार आयोग के 28 अप्रैल 2015 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में आयोग ने जेल में मृत बंदी के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजा देने का सरकार को निर्देश दिया था। यह भी कहा था कि राशि प्रदान करने की सूचना सरकार आयोग को दे। सरकार ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग सिर्फ संस्तुति कर सकता है। सरकार उसकी संस्तुतियों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। आयोग को अपने निर्देशों के अनुपालन की जानकारी मांगने का भी अधिकार नहीं है।

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हाईकोर्ट ने सरकार की दलील को खारिज करते हुए कहा कि मानवाधिकार आयोग का गठन संवैधानिक व्यवस्था के तहत किया गया है। इसको संस्तुतियां करने का अधिकार है, सरकार इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसा करने से संस्था के गठन का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। आयोग के प्रावधानों के अनुसार उसे सरकार से जानकारी मांगने का भी अधिकार है। मानवाधिकार आयोग के पास भी विकल्प मौजूद है कि अपने निर्देशों के अनुपालन हेतु हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट जा सकता है। न्यायिक समीक्षा का विकल्प मौजूद है।

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प्रकरण के अनुसार मुजफ्फनगर जिला कारागार में बंद विचाराधीन कैदी ओमेंद्र की 21 सितंबर 2014 को मृत्यु हो गई। आयोग द्वारा की गई जांच में पता चला कि बंदी वर्ष 2011 से निरुद्ध था। उसे अस्थमा की बीमारी थी मगर जेल में जाने के बाद उसका कोई इलाज नहीं कराया गया। हालत बिगड़ने पर पहले जेल अस्पताल में इलाज किया फिर जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया जहां उसकी मृत्यु हो गई। आयोग ने मानवाधिकार हनन का मामला मानते हुए मुआवजा देने का निर्देश दिया था। 

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