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दूध पिलाने का खर्च कैसे पूरा करेगी सरकार
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 01 Aug 2015 02:13 AM IST
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल के बच्चों को सप्ताह के प्रत्येक बुधवार को दूध पिलाने की योजना को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में प्रदेश सरकार की इस योजना में तमाम खामियां गिनाई गईं हैं। दूध पिलाने पर आने वाली लागत पर भी सवाल उठाए गए हैं। जनहित याचिका की सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति डा. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने सचिव बेसिक शिक्षा से पूछा है कि योजना को लागू करने के लिए बजट का सरकार के पास क्या प्रबंध है। किस प्रकार से इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को सुरक्षित और शुद्ध दूध पिलाया जा सकेगा। इस पर आने वाले खर्च का प्रबंध कहां से और कैसे होगा।
खंडपीठ ने सरकार से जानना चाहा है कि 48 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से दूध है और एक बच्चे को 200 एमएल दूध पिलाने पर होने वाला खर्च मिड डे मील की कन्वर्जन कास्ट से अधिक है। ऐसे में बिना बजट बढ़ाए सरकार इस योजना को कैसे पूरा कर पाएगी। याचिका कानपुर के विनय कुमार ओझा ने दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि दूध पिलाने पर होने वाला खर्च भोजन से अधिक आ रहा है, जबकि सरकार ने कन्वर्जन कास्ट नहीं बढ़ाई है। इस स्थिति में बच्चों को दूध पिलाने की योजना खटाई में पड़ सकती है। याचिका पर अगली सुनवाई छह अगस्त को होगी।
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खंडपीठ ने सरकार से जानना चाहा है कि 48 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से दूध है और एक बच्चे को 200 एमएल दूध पिलाने पर होने वाला खर्च मिड डे मील की कन्वर्जन कास्ट से अधिक है। ऐसे में बिना बजट बढ़ाए सरकार इस योजना को कैसे पूरा कर पाएगी। याचिका कानपुर के विनय कुमार ओझा ने दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि दूध पिलाने पर होने वाला खर्च भोजन से अधिक आ रहा है, जबकि सरकार ने कन्वर्जन कास्ट नहीं बढ़ाई है। इस स्थिति में बच्चों को दूध पिलाने की योजना खटाई में पड़ सकती है। याचिका पर अगली सुनवाई छह अगस्त को होगी।
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