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हाथरस प्रकरणः पीड़ित परिवार को बंधक बनाने का आरोप लगाने वाली याचिका खारिज

Mon, 12 Oct 2020 01:14 AM IST
इलाहाबाद ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: इलाहाबाद ब्यूरो Updated Mon, 12 Oct 2020 01:14 AM IST
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High court rejected  petition over hathras victim family security issue
इलाहाबाद उच्च न्यायालय - फोटो : अमर उजाला

हाथरस कांड में पीड़ित परिवार को प्रशासन की अवैध निरुद्धि से मुक्त कराने और उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करने के लिए दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इंकार करते हुए इसे खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में चल रही है। सुप्रीमकोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पीड़ित परिवार को सुरक्षा सहित कई निर्देश दे रखे हैं। इसे देखते हुए इस मामले में यहां से हस्तक्षेप करने का औचित्य नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि यदि याची चाहे तो सुप्रीमकोर्ट के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं। 

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पीड़ित परिवार की ओर से हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करने वाले सुरेंद्र कुमार का दावा किया था कि प्रशासन ने परिवार को अवैध रूप से निरुद्ध कर रखा है। उनको अपनी मर्जी से कहीं आने जाने या किसी से मिलने की अनुमति नहीं है। याचिका की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने याची द्वारा की गई शिकायत पर लंच के बाद राज्य सरकार के वकील को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिस पर अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने हलफनामा दाखिल कर प्रदेश सरकार का पक्ष रखा। 
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याची पक्ष से वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए अधिवक्ता महमूद प्राचा तथा कोर्ट के समक्ष उपस्थित अधिवक्ता काशिफ अब्बास रिजवी और जॉन अब्बास का कहना था कि प्रशासन पीड़ित परिवार को अपनी मर्जी से कहीं आने-जाने नहीं दे रहा है। उनको अपनी मर्जी से किसी से मिलने या बात भी नहीं करने दी जा रही है। उनके मोबाइल फोन ले लिए गए हैं। कोर्ट द्वारा पीड़ित परिवार के लोगों का वकालतनामा न दाखिल करने के सवाल पर याची सोनीपत हरियाणा निवासी सुरेंद्र कुमार का कहना था कि उसने परिवार के लोगों से फोन पर बात कर अनुमति ली है और व्हाट्सएप मैसेज भी प्राप्त किया है। कोर्ट में व्हाट्सएप मैसेज के स्क्रीन शॉट की प्रति पेश की गई। कहा गया कि प्रशासन ने परिवार के सदस्यों की निजी स्वतंत्रता का हनन किया है। वकीलों की मांग थी कि परिवार के सदस्यों को उनकी मर्जी से लोगों से मिलने और दिल्ली जाने की छूट दी जाए। 
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जबकि प्रदेश सरकार का पक्ष रख रहे अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने याचिका की पोषणीयता पर आपत्ति की। उनका कहना था कि मामले की सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में चल रही है। पीड़ित परिवार का कोई सदस्य कोर्ट नहीं आया है। उनसे वकालतनामा भी नहीं लिया गया। जिस व्यक्ति ने याचिका दाखिल की है, उनको कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने अपने बारे में कोई जानकारी नहीं दी और न ही कोई दस्तावेज पेश किया है।


व्हाट्सएप मैसेज के आधार पर याचिका दाखिल की गई है, जोकि एक फारवर्डेड मैसेज है। इसकी सत्यता का कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। अपर महाधिवक्ता का कहना था कि पीड़ित परिवार को पूरी सुरक्षा दी गई है। परिवार के हर व्यक्ति को दो गनर दिए गए हैं। घर पर आठ सीसीटीवी कैमरे लगाए हैं। परिवार के लोग मीडिया और परिचितों से बिना रोक टोक मिल रहे हैं। परिवार के किसी भी सदस्य ने नहीं कहा है कि उनको कहीं बाहर जाना है। उनकी ओर से लिखित तौर पर कहा गया है कि उनको परेशानी नहीं है। लिखित बयान की प्रति कोर्ट में पेश की गई।

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