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High Court : कर्मचारियों के बकाये वेतन व भत्ते के भुगतान पर रोक, छह सप्ताह में जबाव तलब किया

Sun, 01 Mar 2026 04:48 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 01 Mar 2026 04:48 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन (राष्ट्रीय सहारा) के कर्मचारियों के बकाये वेतन और भत्तों के भुगतान वाले विहित प्राधिकारी के आदेश पर रोक लगा दी है। साथ ही विपक्षियों से छह हफ्ते में जवाब तलब कर स्पष्ट किया है कि प्रबंधन से किसी प्रकार की वसूली नहीं की जाएगी।

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High Court: Withholds payment of pending salaries and allowances to employees
कोर्ट का आदेश। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन (राष्ट्रीय सहारा) के कर्मचारियों के बकाये वेतन और भत्तों के भुगतान वाले विहित प्राधिकारी के आदेश पर रोक लगा दी है। साथ ही विपक्षियों से छह हफ्ते में जवाब तलब कर स्पष्ट किया है कि प्रबंधन से किसी प्रकार की वसूली नहीं की जाएगी।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकल पीठ ने राष्ट्रीय सहारा के प्रबंधन की ओर से दाखिल याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता शक्ति स्वरूप निगम को सुनकर पारित किया है। कहा कि वेतन गणना और अधिनियम की अधिकारिता से जुड़े विवादों में विहित प्राधिकारी की सीमाएं निर्धारित हैं। इसे वह पार नहीं कर सकते।
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सहारा के 80 मजदूरों ने बकाये वेतन और अन्य भत्तों के भुगतान के लिए विहित प्राधिकारी के समक्ष दावा पेश किया था। इसमें से 22 मजदूरों ने अपना दावा वापस ले लिया था। इसके बाद विहित प्राधिकारी ने 21 जनवरी को मजदूरों के पक्ष में आदेश पारित कर बकाये वेतन और भत्ते के भुगतान का आदेश दिया था। इसके खिलाफ प्रबंधन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि संबंधित अधिनियम 1978 केवल उन मामलों में लागू होता है, जहां वेतन की राशि एक निश्चित सीमा (24,000 रुपये) के भीतर हो। यदि वेतन इससे अधिक है तो मामला इस अधिनियम की सीमा से बाहर हो जाता है। कानून के अनुसार केवल बेसिक पे और डीए को ही वेतन माना जाना चाहिए, अन्य भत्तों को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां वेतन की गणना पर ही विवाद हो, वहां विहित प्राधिकारी को आदेश पारित करने का अधिकार सीमित होता है। 

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