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UP : हाईकोर्ट ने कहा- घरेलू हिंसा में अंतिम घटनास्थल की अदालत को सुनवाई का अधिकार

Sat, 20 Sep 2025 05:21 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 20 Sep 2025 05:21 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा में अंतिम बार जहां घटना होती है, वहां की अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने बरेली की अपर सत्र अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।

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High Court says court of last resort has right to hear cases of domestic violence
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा में अंतिम बार जहां घटना होती है, वहां की अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार है। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने बरेली की अपर सत्र अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने चरनजीत कौर की याचिका पर दिया है। बरेली निवासी युवती की शादी उत्तराखंड में हुई थी, लेकिन वह राजस्थान में रह रही थी। घरेलू हिंसा की शिकायत के बाद वह बरेली आ गई और वहां पुलिस से शिकायत की। इस पर थाने में दोनों पक्ष एकत्र हुए तो ससुरालवालों ने उसे धमकी दी।

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इसी घटना के आधार पर उसने बरेली की अदालत में गुजारा भत्ता के लिए याचिका दायर की। इस पर मजिस्ट्रेट ने पति को 9,000 रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इस आदेश को अपर सत्र अदालत ने यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि बरेली की अदालत को इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। इस आदेश को पीड़िता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून के अनुसार जहां पीड़ित स्थायी या अस्थायी रूप से रहता है या जहां विपक्षी रहता है या जहां हिंसा की आखिरी घटना हुई हो, वहां की अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार है। बरेली में ही पीड़िता के साथ आखिरी बार घरेलू हिंसा की घटना हुई थी। इसलिए वहां की अदालत को उसकी याचिका पर सुनवाई का अधिकार है। 

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सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुरादाबाद के सामूहिक दुष्कर्म के आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत दे दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह ने आरोपी अनुज सिरोही की अर्जी पर दिया। अनुज के खिलाफ मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा थाने में अश्लील वीडियो बनाने, वायरल करने के साथ सामूहिक दुष्कर्म के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया है। उसने जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की। याची के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि उसे झूठे आरोपों में फंसाया गया है। उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सीधे तौर पर सही नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि सह-अभियुक्त विजय की याचिका पर हाईकोर्ट ने पहले ही रोक लगा रखी है और शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास है। वहीं, सरकारी वकील ने जमानत का विरोध किया।

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