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हाईकोर्ट ने कहा : टैक्स व पेनाल्टी लगाने से पहले सुनवाई का मौका न देना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ
Thu, 10 Mar 2022 01:50 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 10 Mar 2022 01:50 AM IST
सार
कोर्ट ने टैक्स विभाग के अधिकारियों के रवैए की आलोचना करते हुए 10 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया है। यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी और न्यायमूर्ति जयंत बनर्जी की खंडपीठ ने भारत मिंट एंड एलाइड केमिकल्स की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
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allahabad high court
- फोटो : social media
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जीएसटी के तहत टैक्स निर्धारण और पेनाल्टी लगाने से पहले सुनवाई का मौका न देने पर प्राकृतिक न्याय का उल्लघंन माना है। साथ ही ब्याज सहित टैक्स और पेनाल्टी वसूली आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने वाणिज्य विभाग बरेली को याची को सुनकर नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
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कोर्ट ने टैक्स विभाग के अधिकारियों के रवैए की आलोचना करते हुए 10 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया है। यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी और न्यायमूर्ति जयंत बनर्जी की खंडपीठ ने भारत मिंट एंड एलाइड केमिकल्स की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि प्राकृतिक न्याय के हनन के मामले में अनुच्छेद 226 की अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर याचिका की सुनवाई की जा सकती है। भले ही आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करने का वैकल्पिक उपचार प्राप्त हो। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने पर सुनवाई से इंकार भी कर सकती है। यह हर केस के तथ्यों पर निर्भर होगा।
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याची का कहना था कि बिना सुनवाई का मौका दिए वसूली आदेश प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। सरकार की तरफ से कहा गया कि याची को आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करनी चाहिए थी। याचिका पोषणीय नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कानून में साफ लिखा है और सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने कहा कि लगता है कि अधिकारियों ने कानून नहीं पढ़ा या सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी समझ नहीं सके। सुप्रीम कोर्ट ने दर्जनों ऐसे मामलों का उल्लेख करते हुए कहा है कि वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होने पर भी हाईकोर्ट अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर याचिका की सुनवाई कर सकता है। वैकल्पिक उपचार होने पर याचिका दाखिल करने पर पूर्ण रोक नहीं है। इसके कई अपवाद भी हैं। यह कोर्ट का विवेकाधिकार है।