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हाईकोर्ट : धर्म विशेष की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले वीडियो पर दर्ज एफआईआर रद्द करने से इंकार

Fri, 11 Feb 2022 01:18 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 11 Feb 2022 01:18 AM IST
सार

मामले में चित्रकूट जिले केराजापुर थाने में महेश पांडेय की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इसमें कहा गया था कि उसने फेसबुक पर एक वीडियो देखा था, जिसमें कुछ बयान दिए गए थे और जो कथित तौर पर एक धर्म विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत करते हैं।

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High Court refuses to quash FIR registered on video hurting sentiments of a particular religion
Allahabad High Court

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फेसबुक पर एक धर्म विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले वीडियो के प्रसार पर दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह एक संज्ञेय अपराध है। कानून को देखते हुए प्राथमिकी को रद्द किए जाने की प्रार्थना की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अजय त्यागी की खंडपीठ ने शकील खान की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।

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मामले में चित्रकूट जिले केराजापुर थाने में महेश पांडेय की ओर से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इसमें कहा गया था कि उसने फेसबुक पर एक वीडियो देखा था, जिसमें कुछ बयान दिए गए थे और जो कथित तौर पर एक धर्म विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत करते हैं। इससे लोगों में आक्रोश है। प्राथमिकी में कहा गया है कि वीडियो एक कार्यक्रम था। शिकायतकर्ता ने नामजद आरोपियों के खिलाफ  प्राथमिकी दर्ज कर उचित कार्रवाई की मांग की थी।
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इसके तहत आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 295ए, 505 (2) और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 की धारा 66 के तहत मामला दर्ज किया गया था।  याचिका में कहा गया है कि आरोप बिल्कुल फर्जी है और वास्तव में ऐसा कोई वीडियो प्रसारित नहीं किया गया है, जो किसी धर्म विशेष के सदस्यों की भावनाओं को ठेस पहुंचाए।
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जवाब में सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि सब्बीर खान के खिलाफ  पहले ही आरोप पत्र दायर किया जा चुका है और जांच लंबित है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के वायरल वीडियो में कोई आपत्तिजनक सामग्री है या नहीं, इसकी जांच एजेंसियों द्वारा जांच की जानी आवश्यक है।




रिकॉर्ड पर लाए गए तथ्यों से न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ है और इसलिए न्यायालय ने प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करने से इंकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने मामले में सभी धाराओं में सजा सात साल से कम होने से पुलिस अधिकारियों को जांच करते समय सीआरपीसी की धारा 41 ए केप्रावधानों को ध्यान में रखने का निर्देश दिया है। 

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