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High Court : सोशल मीडिया पर शब्द ही नहीं, संदेश का भाव भी हो सकता है भड़काऊ
Thu, 09 Oct 2025 01:04 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 09 Oct 2025 01:04 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि व्हाट्सएप या सोशल मीडिया पर ऐसा कोई संदेश भेजना या आगे बढ़ाना जो किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ वैमनस्य फैलाने वाला हो, अपराध है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि व्हाट्सएप या सोशल मीडिया पर ऐसा कोई संदेश भेजना या आगे बढ़ाना जो किसी विशेष धर्म या समुदाय के खिलाफ वैमनस्य फैलाने वाला हो, अपराध है। संदेश में प्रत्यक्ष रूप से धर्म विशेष का नाम न होने पर भी यदि उसका भाव धार्मिक समूह को निशाना बनाने वाला है तो वह कानून के दायरे में आएगा। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मेरठ निवासी आफाक अहमद की ओर से एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
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याची पर आरोप था कि उसने एक व्हाट्सएप संदेश कई लोगों को भेजा था। उसमें संकेत था कि उसके भाई के खिलाफ झूठा मुकदमा इसलिए दर्ज किया गया वह एक विशेष धार्मिक समुदाय से है। याची ने एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती दी। दलील दी कि उसने सोशल मीडिया पर किसी धर्म विशेष का जिक्र नहीं किया। लिहाजा, इसे धार्मिक भावना भड़काने वाला नहीं माना जा सकता।
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हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर कहा कि यदि किसी संदेश में धर्म का नाम सीधे न भी लिखा हो लेकिन उसके शब्दों या भावों से यह अर्थ निकलता हो कि किसी खास समुदाय को अन्याय का शिकार बताया जा रहा है तो वह समाज में घृणा, वैमनस्य और अविश्वास को जन्म दे सकता है। ऐसे में यह कृत्य अपराध है। लिहाजा, यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि संदेश में धर्म का उल्लेख नहीं था। इसलिए अपराध नहीं बनता। कानून सिर्फ शब्दों को नहीं, उनके निहितार्थ और प्रभाव को भी देखता है।
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क्या है बीएनएस की धारा 353(2)
यह प्रावधान धार्मिक, भाषायी, जातीय या क्षेत्रीय समूहों के बीच वैमनस्य या दुश्मनी पैदा करने वाले कृत्य को अपराध मानता है। दोष सिद्ध होने पर इसके लिए तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
कोर्ट की नसीहत...सोशल मीडिया पर बरतें सावधानी
हाईकोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में एक साधारण संदेश भी व्यापक असर डाल सकता है। इसलिए नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे सामाजिक सौहार्द और धार्मिक सद्भाव को ठेस पहुंचाने वाली कोई सामग्री साझा न करें।
शब्दों के पीछे छिपा उद्देश्य ही किसी समाज में वैमनस्य का बीज बोता है। कानून ऐसे संकेतों को भी दंडनीय मानता है जो धर्म या संप्रदाय के आधार पर लोगों को बांटने की प्रवृत्ति रखते हों। -इलाहाबाद हाईकोर्ट