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High Court : माता-पिता की उपेक्षा पाप व कानूनन अपराध ,  कोर्ट ने कहा- अदालत मूकदर्शक नहीं बन सकती

Sun, 27 Jul 2025 08:59 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 27 Jul 2025 08:59 AM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस घर में माता-पिता का अपमान हो, वह घर नहीं अन्याय स्थल है। बूढ़े माता-पिता को बेसहारा छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अदालत मूक दर्शक नहीं बन सकती। माता-पिता की उपेक्षा करना न सिर्फ पाप है बल्कि कानूनन अपराध भी है।

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High Court Neglecting parents is a sin and a crime as per law, Court cannot remain a mute spectator
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिस घर में माता-पिता का अपमान हो, वह घर नहीं अन्याय स्थल है। बूढ़े माता-पिता को बेसहारा छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अदालत मूक दर्शक नहीं बन सकती। माता-पिता की उपेक्षा करना न सिर्फ पाप है बल्कि कानूनन अपराध भी है। संत कबीर नगर के मामले की सुनवाई के दाैरान न्यायमूर्ति महेश चन्द्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की अदालत ने उक्त टिप्पणी की।

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याची बुजुर्ग राम दुलार गुप्ता की जमीन को राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित किया गया था। इसके एवज में उनके पक्ष में 21,17,758/- मुआवजा राशि निर्धारित की गई थी लेकिन इस पर उनके बेटे ने हक जताया और उनके संग दुर्व्यवहार शुरू कर दिया। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

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कोर्ट ने बुजुर्ग की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि इससे बड़ा कोई सामाजिक पतन नहीं हो सकता, जब संतान ही अपने माता-पिता की मूक पीड़ा से मुंह मोड़ ले। यह घोर नैतिक दिवालियापन है। कोर्ट ने पाया कि अधिग्रहित संपत्ति का वास्तविक मालिक बुजुर्ग याची ही है। लिहाजा कोर्ट ने अधिग्रहित भूमि के मुआवजे की पूरी राशि याची को अदा करने का आदेश दिया।

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कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष बच्चों की परवरिश में खपा देते हैं। इसके बाद जब उन्हें सहारे की जरूरत होती है, तब वही बच्चे उन्हें ठुकरा देते हैं। यह न केवल अमानवीय है, बल्कि अनुच्छेद-21 के तहत सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का उल्लंघन भी है

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