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High Court :ठाकुर बिहारी जी महाराज मंदिर की जमीन का पट्टा विलेख निष्प्रभावी, कोर्ट में मांगा जवाब

Mon, 06 Jan 2025 06:35 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 06 Jan 2025 06:35 PM IST
सार

यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने राम कुमार गुप्ता की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर दिया है। कोर्ट ने विपक्षियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब भी किया है।

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High Court: Lease deed of land of Thakur Bihari Ji Maharaj temple ineffective, answer sought in court
अदालत। - फोटो : Amar ujala

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाथरस के ठाकुर बिहारी जी महाराज विराजमान के प्राचीन मंदिर की जमीन के 999 साल के लिए निष्पादित पट्टा विलेख को निष्प्रभावी कर दिया है। कोर्ट ने हाथरस के अपर जिला जज के आठ अगस्त के आदेश पर भी रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने राम कुमार गुप्ता की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर दिया है। कोर्ट ने विपक्षियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब भी किया है।

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मामला हाथरस के प्राचीन ठाकुर बिहारी जी महाराज विराजमान मंदिर के ट्रस्ट का है। 1930 से 1964 तक चली लंबी मुकदमेबाजी के बाद राधेश्याम और चिरंजीलाल को मंदिर न्याय का न्यासी नियुक्त किया गया था। इनकी मृत्यु के बाद न्यासी की नियुक्ति से जुड़ा मुकदमा जिला अदालत में लंबित था। इसी दौरान चिरंजीलाल और राधेश्याम के वंशजों ने मंदिर की जमीन का एक बड़ा हिस्सा राधा वर्मा के नाम 22 लाख में 999 साल के लिए पट्टा विलेख लिख दिया।

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इसके खिलाफ याची ने जिला अदालत में अर्जी दाखिल की, जिले अपर जिला जज की अदालत ने आठ अगस्त 2024 को खारिज कर दिया। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने दलील थी कि न्यासियों की नियुक्ति से पहले मंदिर की संपत्ति का पट्टा विलेख नहीं निष्पादित किया जा सकता। इसे निरस्त किया जाए।

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जबकि, विपक्षियों के अधिवक्ता का कहना था कि जिस भूमि के लिए पट्टा विलेख निष्पादित किया गया है, वह मंदिर की अप्रयुक्त है। याची का मंदिर न्याय से कोई रिश्ता वास्ता नहीं है। वह न्यासी भी नहीं है। हालांकि, पट्टा विलेख के निष्पादन की बात से इन्कार नहीं कर सकी।

कोर्ट ने मामले को विचारणीय मानते हुए विपक्षियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। साथ ही अपर जिला जज के आदेश और पट्टा विलेख के प्रभाव और संचालन पर रोक लगा दी।

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