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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Division Bench divided on bulldozer action; matter to be referred to the Chief Justice.

High Court : बुलडोजर कार्रवाई पर खंडपीठ में मतभेद, मामला अब मुख्य न्यायाधीश के पास जाएगा

Wed, 22 Jul 2026 04:44 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 22 Jul 2026 04:44 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामले में विभाजित फैसला सुनाया है। मतभेद इस बात का था कि किसी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी के घर को गिराने की कार्रवाई पर दो वर्ष तक रोक लगनी चाहिए या नहीं।

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High Court: Division Bench divided on bulldozer action; matter to be referred to the Chief Justice.
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामले में विभाजित फैसला सुनाया है। मतभेद इस बात का था कि किसी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी के घर को गिराने की कार्रवाई पर दो वर्ष तक रोक लगनी चाहिए या नहीं। अब मामला मुख्य न्यायाधीश के पास जाएगा।

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हमीरपुर निवासी फैमुद्दीन व अन्य याचियों ने आशंका जताई थी कि उनके रिश्तेदार के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र और पॉक्सो एक्ट समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज है। आरोपी का उनकी संपत्ति में कोई लेनादेना नहीं है। इसके बावजूद आशंका है कि उनके आवास, कमर्शियल लॉज और आरा मिल पर बुलडोजर चलाया जा सकता है। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति श्रीधरन ने आवास और लॉज के विरुद्ध दो साल तक कार्रवाई रोकने का निर्देश दिया, जबकि न्यायमूर्ति नंदन ने इस पर असहमति जताई।
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हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत रहे कि पर्यावरण से जुड़े मामले में फॉरेस्ट एक्ट के तहत आरा मिल के खिलाफ कार्रवाई जारी रह सकती है। वहीं, खंडपीठ के बंटे फैसले पर मुख्य न्यायाधीश निर्णय के लिए तीसरे न्यायाधीश या बड़ी पीठ का गठन करेंगे।

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न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने 51 पृष्ठों के फैसले में कहा कि एफआईआर होने के तुरंत बाद मकान गिराने की कार्रवाई अक्सर जनभावनाओं और प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्होंने इसे कार्यपालिका के विवेक का प्रतिशोधात्मक व छद्म इस्तेमाल बताते हुए प्रस्ताव दिया कि एफआईआर की तारीख से दो साल तक आरोपी के आवासीय भवन को ध्वस्त करने की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। साथ ही तीन साल या उससे अधिक समय से निवास कर रहे लोगों के मामलों में अवैध निर्माण हटाने से पहले एक साल का अग्रिम नोटिस देने का भी सुझाव दिया।

वहीं, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इन दोनों निर्देशों से असहमति जताई। कहा कि दो साल की अनिवार्य रोक और एक साल के अतिरिक्त नोटिस जैसी व्यवस्था न्यायालय की ओर से कानून बनाने के समान होगी, जो विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है। उनके अनुसार इससे वैध नगर नियोजन कानूनों का क्रियान्वयन प्रभावित होगा। अवैध निर्माण बचाने के लिए झूठी एफआईआर दर्ज कराने जैसी प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है।

भ्रष्ट नगरपालिका और पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई हो : खंडपीठ

दोनों न्यायाधीश इस बात पर एकमत रहे कि यदि राज्य केवल किसी आरोपी को निशाना बनाकर नगरपालिका कानूनों का इस्तेमाल करती है तो यह दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई मानी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो ऐसे भ्रष्ट नगरपालिका और पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध भी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने निर्माण होने दिया।

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