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बस्ती जिला जेल की खराब हालत सुधारने का हाईकोर्ट ने दिया यूपी सरकार को निर्देश
Fri, 13 Nov 2020 06:32 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 13 Nov 2020 06:32 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती जिला जेल की व्यवस्था में गड़बड़ियों को दुरुस्त करने और जेल में सुधारात्मक कदम उठाने का राज्य सरकार को निर्देश दिया है। कोर्ट ने उठाए गए कदमों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। बस्ती विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने जेल का निरीक्षक कर अपनी रिपोर्ट दी थी। जिस पर हाईकोर्ट ने जनहित याचिका दाखिल कर सुनवाई शुरू की है। याचिका की अगली सुनवाई 25नवम्बर को होगी।
याचिका पर मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर तथा न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता की खंडपीठ ने सुनवाई की। विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव जेल का निरीक्षण करने गए थे। उन्होंने जेल की दुर्दशा पर प्रशासनिक न्यायाधीश को रिपोर्ट भेजी।जिसे चीफ जस्टिस को भेजा गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला जेल में क्षमता से अधिक कैदी है।सफाई नहीं है।चिकित्सा सुविधा ठीक नहीं है। वोकेशनल ट्रेनिंग की व्यवस्था नहीं है। पैरोल की सुनवाई में अनावश्यक देरी की जाती है। पुस्तकालय नहीं है।कैदियों को साक्षर बनाने के लिए एक अध्यापक हैं किन्तु आते नहीं है। अधिकांश सीसीटीवी कैमरे खराब पड़े हैं।कोरोना संक्रमित बंदियों को अलग रखने की व्यवस्था नहीं है।
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कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट स्वयं बता रही है कि कैदियों की हालत क्या है। कोर्ट ने कहा कि जेलों में दंडात्मक व सुधारात्मक दोनों तरीके को देश में अपनाया गया है। मिक्स फार्मूला लागू है।जेलों में जहां कठोर दंड दिया जाता है वही इसे सुधार गृह भी कहा जाता है। कोर्ट ने कहा कि कैदियों के भी मानवाधिकार है।जिनकी अनदेखी नही की जा सकती। कोर्ट ने रिपोर्ट की प्रति अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल को उचित कार्यवाही के लिए देने का निर्देश दिया है।
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याचिका पर मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर तथा न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता की खंडपीठ ने सुनवाई की। विधिक सेवा प्राधिकरण सचिव जेल का निरीक्षण करने गए थे। उन्होंने जेल की दुर्दशा पर प्रशासनिक न्यायाधीश को रिपोर्ट भेजी।जिसे चीफ जस्टिस को भेजा गया।
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रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला जेल में क्षमता से अधिक कैदी है।सफाई नहीं है।चिकित्सा सुविधा ठीक नहीं है। वोकेशनल ट्रेनिंग की व्यवस्था नहीं है। पैरोल की सुनवाई में अनावश्यक देरी की जाती है। पुस्तकालय नहीं है।कैदियों को साक्षर बनाने के लिए एक अध्यापक हैं किन्तु आते नहीं है। अधिकांश सीसीटीवी कैमरे खराब पड़े हैं।कोरोना संक्रमित बंदियों को अलग रखने की व्यवस्था नहीं है।
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कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट स्वयं बता रही है कि कैदियों की हालत क्या है। कोर्ट ने कहा कि जेलों में दंडात्मक व सुधारात्मक दोनों तरीके को देश में अपनाया गया है। मिक्स फार्मूला लागू है।जेलों में जहां कठोर दंड दिया जाता है वही इसे सुधार गृह भी कहा जाता है। कोर्ट ने कहा कि कैदियों के भी मानवाधिकार है।जिनकी अनदेखी नही की जा सकती। कोर्ट ने रिपोर्ट की प्रति अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल को उचित कार्यवाही के लिए देने का निर्देश दिया है।