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हाईकोर्ट : अपमान के इरादे के बिना जातिसूचक शब्द से पुकारना एससी-एसटी एक्ट का अपराध नहीं
Thu, 20 Aug 2026 06:05 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 20 Aug 2026 06:05 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपमान का इरादा न होने पर जातिसूचक शब्द से पुकारने मात्र से एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने बरेली के विशेष न्यायाधीश की ओर से जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
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कोर्ट का आदेश।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अपमान का इरादा न होने पर जातिसूचक शब्द से पुकारने मात्र से एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने बरेली के विशेष न्यायाधीश की ओर से जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने वेगराज सिंह और दौलत की याचिका पर दिया। इज्जतनगर थाने में मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के साथ उसके पिता वेगराज और भाई दौलत को नामजद करते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
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पुलिस जांच के दौरान पीड़िता के बयानों के आधार पर केवल मुख्य आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया, जबकि वेगराज और दौलत को क्लीनचिट दे दी गई। हालांकि, बाद में ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता के बयान के आधार पर दोनों को समन जारी कर दिया था। याचियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला दिया। कहा कि आपराधिक मामलों में सीआरपीसी की धारा 319 (या बीएनएसएस की धारा 358) के तहत किसी भी व्यक्ति को केवल सामान्य आरोपों के आधार पर समन नहीं किया जा सकता। इसके लिए अदालत के पास ठोस और मजबूत साक्ष्य होने चाहिए। पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जातिगत अपमान का कोई इरादा या विशिष्ट भूमिका साबित नहीं होती है। इसलिए निचली अदालत की ओर से जारी समन आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
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