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राजनीतिक स्तर पर मुश्किल है हाईकोर्ट बेंच का समाधान

Tue, 23 Dec 2014 12:14 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Tue, 23 Dec 2014 12:14 AM IST
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High Court bench is difficult to solve the political level
 इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनाने का मसला राजनीतिक स्तर पर शायद ही कभी हल हो सके। बेंच बनाने में न्यायपालिका की ही भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। जानकारों की मानें तो पहला रोड़ा देश का संविधान ही है। संविधान में एक प्रदेश में एक खंडपीठ होने की बात कही गई है। उत्तर प्रदेश में बेंच बनाने की कोशिशें पहले भी कई बार की जा चुकी है। मगर पूर्व में इस प्रस्ताव को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने ही नकार दिया है।
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बार कौंसिल के सदस्य और पूर्व अध्यक्ष बीके श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ’अवेकनिंग अगेंस्ट बायफरकेशन ऑफ हाईकोर्ट’ में इसका जिक्र किया है। पुस्तक के मुताबिक हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमयू बेग, और सतीश चंद्रा ने 1966 और 1978 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर बेंच बनने से होने वाली कठिनाईयों का जिक्र करते हुए प्रस्ताव से इंकार कर दिया था। बेंच के मुद्दे पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसके वर्मा और केबी अस्थाना भी अपना विरोध जाहिर कर चुके हैं।
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एकीकृत हाईकोर्ट पर पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने भी 1948 में अवध प्रांत के अमलगमेशन के मौके पर सराहना की थी। सुप्रीमकोर्ट भी अपने एक निर्णय में दूरी के आधार पर बेंच की स्थापना को औचित्यहीन और आधार बताते हुए नकार चुका है। हाईकोर्ट के वकीलों का यह भी तर्क है कि मौजूदा समय में जब हम पेपर लेस कोर्ट की ओर बढ़ रहे हैं तो दूरियां कोई महत्व नहीं रखती हैं।
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हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह हाईकोर्ट की बेंच बनाने के पक्ष में नहीं है। उनका कहना है कि वह किसी भी प्रकार के विभाजन के खिलाफ हैं। दरअसल विभाजन का सिद्धांत ही गलत है। पिछले 300 वर्षों में अमेरिका जैसे देश में किसी राज्य का विभाजन नहीं हुआ। विभाजन से राजनीति बढ़ती है। जनता स्वच्छ, त्वरित, निष्पक्ष और स्वतंत्र न्याय चाहिए। इसके लिए सौ या दो सौ किलोमीटर की दूरी मायने नहीं रखती है। अमर उजाला से बात चीत में उन्होंने कहा कि मेरी निजी राय है कि आज के वैज्ञानिक युग में जब वीडियो कान्फ्रेसिंग से बयान दर्ज हो रहे हैं और गवाही हो रही है उस वक्त यह मुद्दा उठाना दरअसल न्याय व्यवस्था को अस्थिर करना है।
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