बाहुबली विधायक विजय मिश्र के अवैध निर्माण को गिराने के लिए ध्वस्तीकरण आदेश और नोटिस जारी होने के 13 साल बाद उस पर अमल किए जाने पर सवाल उठाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीडीए से पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से लंबित ध्वस्तीकरण आदेशों का ब्यौरा तलब किया है।
हाईकोर्ट ने पीडीए से पूछा- विधायक विजय मिश्र के मामले की तरह कितने ध्वस्तीकरण आदेश फाइलों में हैं बंद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रयागराज विकास प्राधिकरण की याचिका पर यह आदेश न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्र ने दिया है। पीडीए ने विजय मिश्र के मकान के ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर कमिश्नर प्रयागराज द्वारा पारित आदेश को याचिका में चुनौती दी है। पीडीए का कहना था कि कमिश्नर ने पीडीए द्वारा ध्वस्तीकरण नोटिस विजय मिश्र को तामील कराए जाने पर अपने आदेश में संदेह जताया है जो गलत है।
हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर कहा कि कमिश्नर ने अपने आदेश में प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर गौर नहीं किया कि नोटिस बकायदा तामील कराया गया है। इसलिए उनके द्वारा इस पर संदेह व्यक्त करना न्याय संगत नहीं है। कमिश्नर ने अपने आदेश में नोटिस तामील कराने के नियम का पालन किस प्रकार नहीं किया गया इसकी कोई चर्चा नहीं की है और न ही संदेह व्यक्त करने का कोई कारण आदेश में दर्ज किया है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि याची ने स्वयं ही अवैध निर्माण गिराने और भवन को वापस आवासीय स्थिति में लाने का हलफनामा दिया है इसलिए इस मुद्दे पर और अधिक चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने गैंगस्टर कोर्ट द्वारा विवादित संपत्ति में स्वरूप में बदलाव न करने संबंधी 28 अक्तूबर के आदेश का जिक्र करते हुए कहा है कि गैंगस्टर एक्ट में संपत्ति अटैच होने की आड़ में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से नहीं बचा सकता है। दोनों प्रक्रिया अलग अलग है। कोर्ट ने कहा गैंगस्टर कोर्ट को सक्षम प्राधिकारी के आदेश में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। गैंगस्टर कोर्ट द्वारा पारित आदेश ध्वस्तीकरण आदेश के अनुपालन में आड़े नहीं आएगा।
13 साल तक कार्रवाई न करने का जवाब नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि विजय मिश्र के अवैध निर्माण के संबंध में 12 दिसंबर 2007 को ध्वस्तीकरण आदेश और नोटिस जारी होने के बाद इसे फाइलों में रख दिया गया। जबकि प्राधिकरण के मुताबिक नोटिस बकायदा तामील कराया गया है और ध्वस्तीकरण करने में कोई वैधानिक बाधा नहीं थी। कमिश्नर के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पिछले 13 वर्षों में इस आदेश का पालन करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। पीडीए के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि इस आदेश को पारित करने के बाद फाइलों में क्यों रख दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ध्वस्तीकरण आदेश जारी होने के बाद उस पर क्रियान्वन न होना गंभीर चिंता का विषय है इससे शहरी विकास अधिनियम का सुनियोजित विकास का उद्देश्य विफल होता है।