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High Court: ट्रायल के प्रारंभिक स्तर पर वाद के दोहराव से जुड़ी आपत्ति के निस्तारण की मांग नहीं कर सकता पक्षकार
Thu, 06 Aug 2026 07:39 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 06 Aug 2026 07:39 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लघुवाद न्यायालय में मुकदमे के दोहराव से जुड़ी आपत्ति का निस्तारण पूर्व के मुकदमों से जुड़े दस्तावेज, साक्ष्यों और तथ्यों की परख के बाद ट्रायल के अंतिम दौर में ही कर सकता है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लघुवाद न्यायालय में मुकदमे के दोहराव से जुड़ी आपत्ति का निस्तारण पूर्व के मुकदमों से जुड़े दस्तावेज, साक्ष्यों और तथ्यों की परख के बाद ट्रायल के अंतिम दौर में ही कर सकता है। किसी भी पक्षकार को ट्रायल के प्रारंभिक स्तर पर इस बिंदु के निस्तारण की मांग करने को अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति डॉ.योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने राजू कश्यप व अन्य की याचिका खारिज कर दी। साथ ही ट्रायल कोर्ट को अनावश्यक स्थगन से बचते हुए वाद का शीघ्र निस्तारण करने का आदेश दिया है।
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मामला सहारनपुर स्थित एक मकान से जुड़े बेदखली के वाद का है। याचियों का कहना था कि इसी विवाद में पहले भी बेदखली का एक वाद खारिज हो चुका है। इसलिए दूसरा वाद रेस जुडीकाटा के सिद्धांत से प्रतिबंधित है। यानी दोबारा यह मुकदमा पोषणीय नहीं है। उन्होंने ट्रायल कोर्ट से इस आपत्ति को प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करने की अर्जी दाखिल की थी, जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया। इसके खिलाफ उन्हाेंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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कोर्ट ने याचिका खारिज कर स्पष्ट किया कि प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम और सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत लघुवाद न्यायालयों में सामान्य दीवानी मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया लागू नहीं होती। यह किसी वाद बिंदु पर पहले विचार हो या बाद में यह कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है। कोई पक्षकार अधिकार पूर्वक किसी वाद बिंदु को पहले तय करने का दावा नहीं कर सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रारंभिक स्तर पर आपत्ति खारिज होने से याचियों का रेस जुडीकाटा का बचाव समाप्त हो जाता। वे अंतिम सुनवाई के समय बचाव के इस आधार को उठाने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
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क्या है रेस जुडीकाटा
इस कानूनी सिद्धांत के तहत एक ही मामले पर एक बार अंतिम फैसला होने के बाद उसी मुद्दे पर फिर से मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में स्थिरता और अंतिमता बनाए रखना है, ताकि बार-बार एक ही विवाद को लेकर अदालतों का समय और संसाधन बर्बाद न हो।