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मुबारक आपा! हमेशा आएगी तुम्हारी याद

Wed, 20 Jul 2016 01:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Wed, 20 Jul 2016 01:53 AM IST
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Happy cool ! Will always miss you
मुबारक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी’ जैसा अमर गीत देने वाली जानी मानी गायिका मुबारक बेगम का जाना इलाहाबादियों को भी भीतर तक अखर गया। भले ही सीधे तौर पर उनका इलाहाबाद से कोई नाता-रिश्ता नहीं रहा लेकिन तकरीबन साढ़े पांच बरस पहले दिसंबर, 2010 में मेडिकल कॉलेज के स्वर्ण जयंती समारोह के मंच पर गूंजी उनकी दिलकश आवाज इलाहाबादियों के दिलोदिमाग में हमेशा के लिए बस गईं।
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उनके जाने के बाद उनसे जुड़ी यादों के पन्ने फिर फड़फड़ाने लगे हैं। उनकी वह यात्रा इसलिए भी अहम रही क्योंकि इलाहाबाद से उन्हें ऐसे समय में न्योता भेजा गया था, जब मुबारक बेहद गुमनामी और गर्दिश में जी रही थीं। आर्थिक विवशता और अब तक सहेजे गए सम्मान से वह मुफलिसी में जीने को मजबूर थीं। सीधे तौर पर उन्हें मदद की बात कहना एक कलाकार के स्वाभिमान पर चोट होती सो कार्यक्रम के नाम पर बुलाकर उनका मान किया गया।
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अंत के दिनों पर मुबारक बेहद परेेशान थीं। बेटी के पार्किन्सन रोग का इलाज करने वाले मुम्बई के डॉक्टर लकड़वाला और अन्य उनसे कोई फीस तो नहीं लेते, पर दवाओं का इन्तजाम उन्हें खु़द ही करना होता था, जिसका महीने का खर्च हजारों में होता था। खु़द उनके अपने कन्धे और घुटने के जोडों में काफी तकलीफ रहती थी, जिससे चलने-फिरने में दिक्क़त होती थी। मदद के लिए पैसे भिजवाने में उनके आत्मसम्मान को ठेस न लगे, इसीलिए उन्हें कार्यक्रम के बहाने बुलावा भेजा गया था।
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मेडिकल कॉलेज में स्टेज शो के दौरान एक बहुत अच्छे स्थानीय गायक ने बेगम साहिबा के साथ मंच पर उनके मशहूर युगल गीत ‘मुझको अपने गले लगा लो’ में रफी साहब वाली लाइनें गाना चाहते थे, पर बेगम ने बड़ी विनम्रता से यह कहते हुए मना कर दिया कि जो लाइनें वह अपनी जिंदगी में एक बार रफी साहब के साथ गा चुकी हैं, उसे दोबारा कभी किसी और के साथ नहीं गा सकतीं। रफी साहब की जगह कोई और ले ही नहीं सकता है।


समारोह के तत्कालीन संयोजक डॉ.नीरज त्रिपाठी ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, ‘अमर उजाला’ में उनके बारे में छपी एक खबर ने ही हमें उनसे मिलने और इलाहाबाद के स्टेज तक लाने के लिए प्रेरित किया। तमाम कोशिशों के बाद उनका नंबर मिल सका। फोन किया तो वह खाना खा रही थीं लेकिन खाना छोड़कर उन्होंने ऐसी आत्मीयता से बात की जैसा बरसों पुराना नाता हो। फरमाइश पर पसंदीदा गाने भी सुनाये। बातों -बातों में यह भी पता चला कि बुलाने पर वे अभी भी जाकर स्टेज प्रोग्राम दे देती हैं। ऐसे में तमाम नए-पुराने नामों के बीच से मुबारक को ही समारोह के लिए न्योता गया। दोबारा आने की तमन्ना और वायदे के साथ वह भी यहां की बेहद अच्छी यादें लेकर गयी थीं लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा।
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