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सामाजिक मानकों ने सौंपी, पति-पत्नी को जिम्मेदारियां
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 02 Apr 2016 01:29 AM IST
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करीना कपूर खान और अर्जुन कपूर अभिनीत फिल्म ‘की एंड का’ ने समाज में पति-पत्नी की जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। फिल्म में जिस तरह से अर्जुन कपूर को एक पत्नी और कॅरियर के प्रति बेहद महत्वाकांक्षी करीना को पति की जिम्मेदारी निभाते दिखाया गया है, वह वर्तमान सामाजिक परिवेश के लिहाज से बेहद अनूठा है। आमतौर पर समाज में अब भी पुरुषों को घर के बाहर जबकि महिलाओं को घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है। महिला अगर कामकाजी है तो भी गृहस्थी की जिम्मेदारी उठाना उसी के खाते का काम माना जाता है।
समाजशास्त्री हेमलता श्रीवास्तव कहती हैं कि हमारा 80 प्रतिशत समाज पितृसत्तात्मक है, इसलिए लोगों को यह सब नया लग रहा है। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी ऐसी हैं, जिसमें पुरुष और महिला को उनके मानकों के मुताबिक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। वहीं मातृसत्तात्मक समाज में खर्च चलाने से लेकर सारे फैसले महिलाएं ही लेती हैं। अगर हम घर के बाहर निकल कर देखें तो ढाबे, होटलों में खाना बनाने वाले ज्यादातर शेफ पुरुष हैं, कपड़े धोने वाले से लेकर सिलने वाले तक ज्यादातर पुरुष ही हैं। बावजूद इसके पितृसत्तात्मक समाज में घर की चहारदीवारी के भीतर इन सभी कामों की अपेक्षा महिलाओं से ही की जाती है। बेटियों के दिमाग में भी शुरू से ही ऐसी भावना डाली जाती है कि वह जितना भी पढ़-लिख लें, ससुराल जाकर उसे गृहस्थी से जुड़ना ही पड़ेगा।
वरिष्ठ लेखिका उर्मिला जैन कहती हैं, समय के साथ संस्कृति भी बदलती है। सिर्फ महिलाओं पर ही गृहस्थी संभालने की अपेक्षा और दबाव उचित नहीं है। अगर कोई महिला कॅरियर को लेकर काफी महत्वाकांक्षी है तो शादी का फैसला भी उस पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। अधिवक्ता निधि पी सिंह कहती हैं, महिला और पुरुष, दोनों की जिम्मेदारियां तय हैं। समय के साथ समाज लगातार बदलता है। हालांकि पुरुष प्रधान समाज में ऐसी बातें स्वीकार्य नहीं हैं, लेकिन समय की जरूरतें हर परिवर्तन को पुख्ता कर देती हैं। पश्चिमी देशों में तो ऐसे उदाहरण आम हैं।
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सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अजामिल कहते हैं, घर की जिम्मेदारियों का बंटवारा पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य का विषय है। अगर महिलाएं घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी निभा सकती हैं तो फिर पुरुष घर की जिम्मेदारी क्यों नहीं संभाल सकते हैं। बदलते वक्त के साथ सभी को सोच बदलने की जरूरत है। आज जब बात हर ओर समानता की हो रही है तो फिर किसी एक पर ही सारी जिम्मेदारी थोपने की जरूरत ही नहीं है। कल्याणी देवी निवासी बैंककर्मी अनिल टंडन कहते हैं, पति और पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं, ऐसे में तकरीबन सभी जिम्मेदारियों में उनकी सामूहिक भागीदारी होनी चाहिए, कोई भी चीज किसी एक पर थोपने का कोई मतलब नहीं है। सामाजिक ढांचे के मुताबिक दोनों की पारिवारिक जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, सो उन्हें उनके मुताबिक ही पालन करना होगा, जहां जरूरत हो,वहां दोनों एक दूसरे को सहयोग कर सकते हैं।
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समाजशास्त्री हेमलता श्रीवास्तव कहती हैं कि हमारा 80 प्रतिशत समाज पितृसत्तात्मक है, इसलिए लोगों को यह सब नया लग रहा है। हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी ऐसी हैं, जिसमें पुरुष और महिला को उनके मानकों के मुताबिक जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। वहीं मातृसत्तात्मक समाज में खर्च चलाने से लेकर सारे फैसले महिलाएं ही लेती हैं। अगर हम घर के बाहर निकल कर देखें तो ढाबे, होटलों में खाना बनाने वाले ज्यादातर शेफ पुरुष हैं, कपड़े धोने वाले से लेकर सिलने वाले तक ज्यादातर पुरुष ही हैं। बावजूद इसके पितृसत्तात्मक समाज में घर की चहारदीवारी के भीतर इन सभी कामों की अपेक्षा महिलाओं से ही की जाती है। बेटियों के दिमाग में भी शुरू से ही ऐसी भावना डाली जाती है कि वह जितना भी पढ़-लिख लें, ससुराल जाकर उसे गृहस्थी से जुड़ना ही पड़ेगा।
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वरिष्ठ लेखिका उर्मिला जैन कहती हैं, समय के साथ संस्कृति भी बदलती है। सिर्फ महिलाओं पर ही गृहस्थी संभालने की अपेक्षा और दबाव उचित नहीं है। अगर कोई महिला कॅरियर को लेकर काफी महत्वाकांक्षी है तो शादी का फैसला भी उस पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। अधिवक्ता निधि पी सिंह कहती हैं, महिला और पुरुष, दोनों की जिम्मेदारियां तय हैं। समय के साथ समाज लगातार बदलता है। हालांकि पुरुष प्रधान समाज में ऐसी बातें स्वीकार्य नहीं हैं, लेकिन समय की जरूरतें हर परिवर्तन को पुख्ता कर देती हैं। पश्चिमी देशों में तो ऐसे उदाहरण आम हैं।
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सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अजामिल कहते हैं, घर की जिम्मेदारियों का बंटवारा पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य का विषय है। अगर महिलाएं घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी निभा सकती हैं तो फिर पुरुष घर की जिम्मेदारी क्यों नहीं संभाल सकते हैं। बदलते वक्त के साथ सभी को सोच बदलने की जरूरत है। आज जब बात हर ओर समानता की हो रही है तो फिर किसी एक पर ही सारी जिम्मेदारी थोपने की जरूरत ही नहीं है। कल्याणी देवी निवासी बैंककर्मी अनिल टंडन कहते हैं, पति और पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं, ऐसे में तकरीबन सभी जिम्मेदारियों में उनकी सामूहिक भागीदारी होनी चाहिए, कोई भी चीज किसी एक पर थोपने का कोई मतलब नहीं है। सामाजिक ढांचे के मुताबिक दोनों की पारिवारिक जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, सो उन्हें उनके मुताबिक ही पालन करना होगा, जहां जरूरत हो,वहां दोनों एक दूसरे को सहयोग कर सकते हैं।