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UP: जेनेटिक जांच से 15 साल पहले पता चल जाएगा डायबिटीज होगी या नहीं, एंटीऑक्सीडेंट जीन वेरिएंट की हुई पहचान
Thu, 12 Mar 2026 10:58 AM IST
Sharukh Khan
मानसी त्रिपाठी, अमर उजाला, प्रयागराज
मानसी त्रिपाठी, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: Sharukh Khan
Updated Thu, 12 Mar 2026 10:58 AM IST
सार
जेनेटिक जांच से 15 साल पहले पता चल जाएगा डायबिटीज होगी या नहीं। संभावित खतरे का पता लगाने वाले एंटीऑक्सीडेंट जीन की पहचान कर ली गई है। एंटीऑक्सीडेंट जीन वेरिएंट शरीर में सक्रिय एंजाइम की कमी का कारण बनते हैं, जिन्हें रिस्क वेरिएंट कहा जाता है।
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डायबिटीज
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
वैज्ञानिकों ने डायबिटीज (मधुमेह) के संभावित खतरे का पता लगाने वाले जीन की पहचान कर ली है, जो 10 से 15 साल पहले यह बता देगा कि भविष्य में डायबिटीज होगी या नहीं।
शरीर में मौजूद कुछ एंटीऑक्सीडेंट जीन जैसे सीएटी, जीएसटीपी-वन, जीपीएक्स-वन, एसओडी-टू में होने वाले बदलाव डायबिटीज के खतरे से जुड़े हैं। शरीर में बनने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को नियंत्रित करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जब इन जीन में विशेष प्रकार के बदलाव होते हैं तो भविष्य में टाइप-टू डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है। एंटीऑक्सीडेंट जीन वेरिएंट शरीर में सक्रिय एंजाइम की कमी का कारण बनते हैं, जिन्हें रिस्क वेरिएंट कहा जाता है।
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शरीर में मौजूद कुछ एंटीऑक्सीडेंट जीन जैसे सीएटी, जीएसटीपी-वन, जीपीएक्स-वन, एसओडी-टू में होने वाले बदलाव डायबिटीज के खतरे से जुड़े हैं। शरीर में बनने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को नियंत्रित करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
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जब इन जीन में विशेष प्रकार के बदलाव होते हैं तो भविष्य में टाइप-टू डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है। एंटीऑक्सीडेंट जीन वेरिएंट शरीर में सक्रिय एंजाइम की कमी का कारण बनते हैं, जिन्हें रिस्क वेरिएंट कहा जाता है।
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इनकी जेनेटिक जांच के जरिये 10 से 15 साल पहले संभावित खतरे का भांपा जा सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार जेनेटिक स्क्रीनिंग को स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए तो समय रहते डायबिटीज की पहचान की जा सकती है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) की आणविक एवं मानव आनुवंशिकी प्रयोगशाला के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पुष्पांक वत्स और उनकी टीम के इस शोध को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘करेंट फार्माकोजीनोमिक्स एंड पर्सनलइज्ड मेडिसिन’ में प्रकाशित किया गया है। शोध में परिवारों के आनुवंशिक विश्लेषण के आधार पर बीमारी के जोखिम को समझने का प्रयास किया गया है।
शोध के दौरान 48 लोगों पर अध्ययन
डॉ. वत्स ने भारत के नौ परिवारों के 48 लोगों पर अध्ययन किया। इन परिवारों में कम से कम एक सदस्य को टाइप-2 डायबिटीज थी। इन सभी लोगों के डायबिटीज के स्तर, बॉडी मास इंडेक्स, कमर-कूल्हे के अनुपात और उनके डीएनए में मौजूद कुछ खास जीन वेरिएंट का विश्लेषण किया गया। पाया गया कि कुछ विशेष जीन वेरिएंट ऐसे हैं, जो यह संकेत दे सकते हैं कि किसी व्यक्ति को भविष्य में डायबिटीज होने का कितना खतरा है।
डॉ. वत्स ने भारत के नौ परिवारों के 48 लोगों पर अध्ययन किया। इन परिवारों में कम से कम एक सदस्य को टाइप-2 डायबिटीज थी। इन सभी लोगों के डायबिटीज के स्तर, बॉडी मास इंडेक्स, कमर-कूल्हे के अनुपात और उनके डीएनए में मौजूद कुछ खास जीन वेरिएंट का विश्लेषण किया गया। पाया गया कि कुछ विशेष जीन वेरिएंट ऐसे हैं, जो यह संकेत दे सकते हैं कि किसी व्यक्ति को भविष्य में डायबिटीज होने का कितना खतरा है।
समय रहते सावधानी से कम हो सकता है खतरा
कैंटोनमेंट जनरल हॉस्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एसके पांडेय बताते हैं कि जीवनशैली में बदलाव करके इस बीमारी को काफी हद तक टाला जा सकता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और समय-समय पर स्वास्थ्य की जांच जैसी आदतें अपनाने से डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सकता है।
कैंटोनमेंट जनरल हॉस्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एसके पांडेय बताते हैं कि जीवनशैली में बदलाव करके इस बीमारी को काफी हद तक टाला जा सकता है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और समय-समय पर स्वास्थ्य की जांच जैसी आदतें अपनाने से डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सकता है।
क्या है जेनेटिक स्क्रीनिंग
जेनेटिक स्क्रीनिंग ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति के डीएनए की जांच करके यह देखा जाता है कि उसमें बीमारी से जुड़े जीन मौजूद हैं कि नहीं। इस तकनीक की मदद से डॉक्टर यह अंदाजा लगा सकते हैं कि किसी व्यक्ति को भविष्य डायबिटीज का कितना जोखिम है।
जेनेटिक स्क्रीनिंग ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति के डीएनए की जांच करके यह देखा जाता है कि उसमें बीमारी से जुड़े जीन मौजूद हैं कि नहीं। इस तकनीक की मदद से डॉक्टर यह अंदाजा लगा सकते हैं कि किसी व्यक्ति को भविष्य डायबिटीज का कितना जोखिम है।