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दोस्त से ही जाना, औरों के काम आना

Sun, 02 Aug 2015 01:49 AM IST
सुरभि गुप्ता/अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
सुरभि गुप्ता/अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 02 Aug 2015 01:49 AM IST
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Friend go , others come work
इलाहाबाद। फिल्म शोले के जय-वीरू की दोस्ती सभी के जेहन में आज भी ताजा है। दोनों एक-दूसरे पर मर मिटने को हमेशा तैयार रहते थे। मगर सिर्फ जय और वीरू नहीं बल्कि शहर में दोस्तों के कई ग्रुप दोस्ती की नई परिभाषा रच रहे हैं। दूसरों की मदद केलिए ‘साथियों का हाथ बढ़ाना’ दोस्ती के लिए मिसाल है। सुखद यह कि यह पहल सिर्फ एक-दूसरे के लिए नहीं बल्कि पूरे समाज की बेहतरी और जरूरतमंदों के लिए हैं।
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मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के पीजी के छात्रों ने अपने दोस्त डॉ.श्रवण शर्मा के सपने को पूरा करने के लिए ‘हेल्दी इंडिया मिशन’ ग्रुप को जीवंत किया है। ग्रुप में फिलहाल 15 से ज्यादा डॉक्टर्स जुड़े हुए हैं। ग्रुप के संस्थापक डॉ. सुशील कुमार कहते हैं, उनका ग्रुप अब तक पांच निशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगा चुका है। ये डॉक्टर्स, स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय में भी जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्तदान सहित अस्पताल आने वाले मरीजों की जांच कराने और उनके आपरेशन में मदद करते हैं।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय और डिग्री कॉलेजों के जरूरतमंद छात्र-छात्राओं की मदद करना ही फ्रेंड्स यूनियन का मकसद है। ग्रुप केसदस्य जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को चिकित्सीय सहायता देने, ट्यूशंस उपलब्ध कराने के साथ ही जरूरत के सामान भी उपलब्ध कराते हैं। इविवि के बीटेक के छात्र अभिषेक पांडेय कहते हैं, दो बरस पहले फ्रेंड्स यूनियन की परिकल्पना तब बनी जब मेरे दोस्त रवि प्रताप के एक्सीडेंट के वक्त आर्थिक मदद के लिए कोई साथ नहीं आया था। इस घटना के बाद ही ऐसे लोगों ने ऐसा ग्रुप बनाने का फैसला लिया जो दूसरों की मदद कर सके।
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एमएनएनआईटी में बीटेक छात्र-छात्राओं का ग्रुुप ‘बिलीव इन यू’ स्कूल, कॉलेजों के विद्यार्थियों के लिए समय-समय पर मोटीवेशनल सेमिनार  आयोजित करता है। ग्रुप के संस्थापक अंकित पुरोहित कहते हैं, एक वर्ष पहले दोस्तों के साथ मिलकर यह ग्रुप बनाया था। मौजूदा दौर में मोटिवेशन बहुत जरूरी है क्योंकि दोस्त की तरह सच्चे मार्गदर्शक के बिना कई बार सफलता लौट जाती है। इसीलिए ग्रुप बनाकर स्कूल कॉलेजों के बच्चों को मोटीवेट करने का निर्णय लिया, ताकि वे कभी भी हीन भावना का शिकार न हों और जिंदगी में आगे बढ़ते जाएं। अब तक हम आठ से भी ज्यादा सेमिनार कर चुके हैं।
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