सवाल-जवाब: केशरीनाथ त्रिपाठी बोले- चुनावी भाषण में व्यक्तिगत आलोचना गलत, अटल युग में होता था मर्यादापूर्ण भाषा का प्रयोग
पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल एवं यूपी विधानसभा के अध्यक्ष रहे केशरीनाथ त्रिपाठी ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी मर्यादापूर्ण भाषण का प्रयोग करने वाले लोगों में प्रतीक पुरुष थे। वह कभी नाराज भी होते तो भी उनकी भाषा मर्यादित होती थी। राजनीतिक दलों के नेताओं से वार्तालाप में वह बहुत ही संयमित और सीमित शब्दों का प्रयोग करते थे।
विस्तार
पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल एवं यूपी विधानसभा के अध्यक्ष रहे केशरीनाथ त्रिपाठी राजनीति में व्यक्तिगत आलोचना को सही नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि चुनावी सभाओं में किसी की भी व्यक्तिगत आलोचना नहीं होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल का नाम लिए बगैर उन्होंने कहा कि चुनावी जनसभाओं में अटल युग या उससे पहले मर्यादापूर्ण भाषणों का प्रयोग होता था, लेकिन अब इसमें बदलाव आने लगा है। अब प्राय: सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं में अच्छे संबंध देखने को नहीं मिलते। उन्होंने पहले और अब की भाजपा में भी काफी अंतर बताया। पिछले कुछ दिनों से स्लिप डिस्क की समस्या से जूझ रहे केशरीनाथ त्रिपाठी ने ऐसे ही तमाम मुद्दों पर बेबाकी से अमर उजाला के सामने अपनी बातें रखीं। पेश है राहुल शर्मा की उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...
राजनीति में किस तरह का बदलाव देखते हैं?
90 के दशक के बाद से राजनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पहले व्यक्तिगत आलोचना कम या नहीं के बराबर होती थी। अब चुनावी भाषणों में व्यक्तिगत आलोचना का प्रचलन अधिक हो गया है। राजनीतिक आदर्श पीछे छूटते चले गए। आज के नेताओं में प्राय: मर्यादाहीन भाषा का प्रयोग, व्यक्तिगत द्वेष दिखाई देता है। इसी का नतीजा है कि राजनीतिज्ञों और राजनीतिक संस्थाओं के प्रति आमजन के मन में अब आस्था की कमी दिखाई देती है। जनसेवा की जो कल्पना थी, उसमें अंतर आ गया। धीरे-धीरे जनसेवा थाना-पुलिस और सरकारी कार्यालयों तक सीमित हो गई है। इससे राजनीति में विकृति पैदा हुई है। इसका परिणाम आज हम देख रहे हैं। राजनीतिक आंदोलनों का स्वरूप भी धीरे-धीरे बदल गया है। पहले धरना-प्रदर्शन ज्यादा होते थे। आंदोलन भी अलग-अलग तरह के होते थे। लेकिन राजनीतिक आंदोलनों में जेल जाना धीरे-धीरे मजाक हो गया। सड़कें जाम करना, रेल रोकना ऐसे कार्यक्रमों को धीरे-धीरे राजनीतिक दल अपनाने लगे।
भाजपा में टिकट वितरण के तब क्या मानक थे?
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मैं कार्य कर चुका हूं। टिकट वितरण में पहले और अब में ज्यादा अंतर नहीं आया है। पहले भी देखा जाता था कि किस व्यक्ति की किस क्षेत्र में कितनी लोकप्रियता है। प्रत्याशी जीतने लायक है या नहीं। एक जमाना वह भी था, जब हमारी पार्टी के पास उम्मीदवारों की कमी होती थी। तब हमारा संगठन जिसे भी चुनाव लड़ने के लिए कहता, वह लड़ लेता था। हारेंगे या जीतेंगे, इस बात की चिंता तब हम नहीं करते थे। संगठन का विस्तार करना है, इस उद्देश्य से हम चुनाव लड़ते थे।
कोई अविस्मरणीय राजनीतिक घटना जिसे आप साझा करना चाहते हों?
मेरे राजनीतिक जीवन में कई घटनाएं हुईं, लेकिन 1969 का वाकया काफी दिलचस्प रहा। तब विधानसभा चुनाव में राजमाता विजयाराजे सिंधिया को प्रयागराज बुलाया गया था। पर, उन्होंनेे यह कह दिया कि कांग्रेस के खिलाफ जो पार्टी नंबर दो पर होगी मैं उसी प्रत्याशी का प्रचार करूंगी। संयोगवश तब जनसंघ का उम्मीदवार नगर उत्तरी और दक्षिणी में नंबर दो पर नहीं था। राजमाता ने अपने सिद्धांत केअनुसार जनसंघ का प्रचार करने से इनकार कर दिया। पीडी टंडन पार्क में उनकी जनसभा का आयोजन हुआ। वह उस समय प्रयागराज की सबसे बड़ी जनसभा थी। उसमें तकरीबन 40 हजार लोग शामिल हुए थे। राजमाता को समझाने का जिम्मा मुझे दिया गया। मैंने उनसे कहा कि आप जनसंघ के बुलावे पर प्रयागराज आई हैं। इसलिए आपको जनसंघ के पक्ष में भाषण देना चाहिए। हालांकि, उन्होंने कहा कि विपक्ष में जो मजबूत उम्मीदवार होगा, मैं उसको ही जिताने की अपील करूंगी। उनके कहने पर ही जनसभा सेे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीन दयाल उपाध्याय के पोस्टर और जनसंघ के झंडे हटाए जाने लगे तब जनसंघ के नेतृत्व ने मुझसे कहा कि अब आप भाषण दें। ऐसा भावुकतापूर्ण भाषण दें कि जनता उससे प्रभावित हो। मैंने भाषण देना शुरू किया। वह मेरे सर्वश्रेष्ठ भाषणों में एक था। इसके बाद राजमाता ने अपना भाषण दिया।
आपकी राजनीति में कैसे एंट्री हुई?
मुझे भाषण देना अच्छा लगता था। इसको लेकर मेरे साथी मुझे प्रोत्साहित करते। फिर जनसंघ में एक कार्यकर्ता के रूप में मैंने अपनी पारी शुरू की। जनसंघ में धीरे-धीरे एक अच्छे वक्ता के रूप में मेरी पहचान हुई। छोटी-बड़ी सभाओं में भाषण देने के लिए मुझे अवसर मिलते गए। इन सबसे राजनीतिक सक्रियता बढ़ती गई। वहीं, विभिन्न संगठनात्मक पदों पर रहने के कारण कार्यकर्ताओं में मेरे प्रति विश्वास बना रहा। 1977 में पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर मैं झूंसी से विधायक बना। हालांकि उसके पूर्व विधान परिषद के चुनाव में मुझे हार का सामना करना पड़ा था। मैं एकमात्र ऐसा व्यक्ति हूं जो प्रयागराज दक्षिण विधानसभा सीट से पांच बार विधायक रहा। राजनीति के साथ मैंने अपनी वकालत पर भी फोकस किया। इसी वजह से विधि के क्षेत्र में भी लोग मुझे जानने लगे।
पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की कार्यशैली में क्या अंतर देखते हैं?
इन दोनों की ही अलग कार्यशैली है। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी मर्यादापूर्ण भाषण का प्रयोग करने वाले लोगों में प्रतीक पुरुष थे। वह कभी नाराज भी होते तो भी उनकी भाषा मर्यादित होती थी। राजनीतिक दलों के नेताओं से वार्तालाप में वह बहुत ही संयमित और सीमित शब्दों का प्रयोग करते थे। उनकी वाणी में कठोरता नहीं, दृढ़ता थी। पीएम मोदी की बात करें तो वह स्पष्टवादी नेता हैं। बेधड़क अपनी बात रखते हैं। वह जो निर्णय लेते हैं उसे क्रियान्वित करने के लिए पूरी तन्मयता से जुट जाते हैं। पीएम मोदी की राह पर सीएम योगी भी चल रहे हैं। शायद इसी वजह से सीएम योगी आज के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं।