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Prayagraj News: वकालतनामे पर फर्जीवाड़ा, कोर्ट बोला-आरोपों ने झकझोर दिया है अदालत का जमीर
Thu, 16 Jul 2026 02:20 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Thu, 16 Jul 2026 02:20 AM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट में गाजीपुर के नेहरू विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रबंध समिति को लेकर दाखिल याचिका में दाखिल वकालतनामे में फर्जीवाड़ा सामने आया है। इसके प्रामाणिकता सवाल उठाते हुए दाखिल पुनर्विलोकन याचिका पर कोर्ट ने वकालतनामे पर किए हस्ताक्षर की हस्तलेख विशेषज्ञ से जांच कराने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोपों ने अदालत के जमीर को झकझोर दिया है। सुनवाई के दौरान विवाद उस वकालतनामे को लेकर सामने आया, जो एक अधिवक्ता ने सत्यापित किया था। हालांकि, पिछली सुनवाई में उन्होंने कोर्ट को बताया था कि हस्ताक्षर का सत्यापन उन्होंने नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने किया था।
कोर्ट के आदेश पर याची शिव शंकर सिंह यादव और भोला सिंह यादव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। शिव शंकर सिंह ने अदालत में कहा कि उन्होंने मौजूदा मामले में कभी उन्हें अधिवक्ता नियुक्त नहीं किया। अंतिम बार 21 जनवरी को केवल एक अन्य याचिका में जवाबी हलफनामा दाखिल कराने के लिए उनके चैंबर गए थे।
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दूसरी ओर भोला सिंह यादव ने अपने हलफनामे में दावा किया कि अप्रैल 2026 में वह और शिव शंकर सिंह दोनों साथ में अधिवक्ता के आवास गए थे, जहां कैविएट दाखिल करने के लिए उनके क्लर्क को रुपये भी दिए थे।
कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथमदृष्टया शिव शंकर सिंह की सफाई स्वीकार करने योग्य नहीं है। साथ ही यह भी माना कि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि अधिवक्ता ने स्वयं वकालतनामा तैयार किया हो, हालांकि उन्होंने हस्ताक्षर का सत्यापन क्लर्क के जरिये होने की बात स्वीकार की है।
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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोपों ने अदालत के जमीर को झकझोर दिया है। सुनवाई के दौरान विवाद उस वकालतनामे को लेकर सामने आया, जो एक अधिवक्ता ने सत्यापित किया था। हालांकि, पिछली सुनवाई में उन्होंने कोर्ट को बताया था कि हस्ताक्षर का सत्यापन उन्होंने नहीं, बल्कि उनके क्लर्क ने किया था।
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कोर्ट के आदेश पर याची शिव शंकर सिंह यादव और भोला सिंह यादव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। शिव शंकर सिंह ने अदालत में कहा कि उन्होंने मौजूदा मामले में कभी उन्हें अधिवक्ता नियुक्त नहीं किया। अंतिम बार 21 जनवरी को केवल एक अन्य याचिका में जवाबी हलफनामा दाखिल कराने के लिए उनके चैंबर गए थे।
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दूसरी ओर भोला सिंह यादव ने अपने हलफनामे में दावा किया कि अप्रैल 2026 में वह और शिव शंकर सिंह दोनों साथ में अधिवक्ता के आवास गए थे, जहां कैविएट दाखिल करने के लिए उनके क्लर्क को रुपये भी दिए थे।
कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास है। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथमदृष्टया शिव शंकर सिंह की सफाई स्वीकार करने योग्य नहीं है। साथ ही यह भी माना कि ऐसा प्रतीत नहीं होता कि अधिवक्ता ने स्वयं वकालतनामा तैयार किया हो, हालांकि उन्होंने हस्ताक्षर का सत्यापन क्लर्क के जरिये होने की बात स्वीकार की है।