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High Court : वन दरोगा की नौकरी बहाल, कोर्ट ने कहा-नियुक्ति के वक्त उम्र कम थी पर धोखाधड़ी या छिपाया नहीं

Thu, 06 Nov 2025 04:02 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 06 Nov 2025 04:02 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वन दरोगा की सेवाओं की नियमितीकरण को रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला छिपाव, धोखाधड़ी या गलत बयानी का नहीं है। याची काफी समय से सेवाएं दे रहा है।

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Forest Inspector reinstated; court says he was underage at the time of appointment but there was no fraud or
अदालत का आदेश - फोटो : istock

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वन दरोगा की सेवाओं की नियमितीकरण को रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला छिपाव, धोखाधड़ी या गलत बयानी का नहीं है। याची काफी समय से सेवाएं दे रहा है। ऐसे में उसे न्याय के सिद्धांतों को लागू करते हुए राहत दी जानी चाहिए।

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यह आदेश न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने वाराणसी के अंजनी कुमार सिंह की याचिका पर दिया। अंजनी को जनवरी 1991 में वन विभाग में दैनिक वेतन भोगी के रूप में ग्रुप सी के पद पर नियुक्त किया गया था। उनकी सेवाओं को उत्तर प्रदेश दैनिक वेतन नियुक्तियों के नियमितीकरण नियम-1998 के तहत 26 मार्च 2002 को नियमित कर दिया गया था।

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हालांकि, सात मई 2003 को वन संरक्षक वाराणसी ने उनके नियमितीकरण को रद्द कर दिया। कहा कि प्रारंभिक नियुक्ति के समय (जनवरी 1991) उनकी उम्र 16 साल आठ महीने 28 दिन थी, जो न्यूनतम 18 वर्ष से कम थी।

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कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि याची 1991 से लगातार कार्यरत है। 2003 में रद्दीकरण के बाद भी कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत अपनी सेवाएं देता रहा। कोर्ट ने स्थायी अधिवक्ता से स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या यह मामला याची की ओर से किए गए किसी छिपाव और धोखाधड़ी या गलत बयानी का है, जिसका उत्तर नकारात्मक था। यह भी पुष्टि की गई कि याची के सेवा रिकॉर्ड में कोई अन्य कमी नहीं है।

कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय और अपनी ही खंडपीठ के पूर्व के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी को कम उम्र में नियुक्त कर लिया जाता है और इसमें उसकी कोई धोखाधड़ी नहीं है तो दोनों पक्ष (कर्मचारी और विभाग) समान रूप से जिम्मेदार माने जाते हैं। ऐसे में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद उसे केवल इस आधार पर नौकरी से हटाना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

कोर्ट ने वन संरक्षक वाराणसी के सात मई 2003 को पारित नियमितीकरण रद्द करने के आदेश को रद्द कर दिया और याची के 26 मार्च 2002 के नियमितीकरण आदेश को बहाल कर दिया। साथ ही उसे कानून के अनुसार सभी परिणामी लाभ पाने का हकदार घोषित कर दिया गया है।

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