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UP : पति के खिलाफ झूठा केस दर्ज कराना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं कहा जा सकता, पत्नी को हाईकोर्ट से मिली राहत
Thu, 09 Apr 2026 02:20 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 09 Apr 2026 02:20 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में पत्नी की ओर से पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति समीर जैन की एकल पीठ ने पत्नी व उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
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कोर्ट का फैसला
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवाद में पत्नी की ओर से पति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति समीर जैन की एकल पीठ ने पत्नी व उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
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सहारनपुर निवासी महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में ट्रायल कोर्ट की ओर से जारी चार्जशीट और मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने की गुहार लगाई थी। संबंधित मामले में मृतक के पिता ने अगस्त 2022 में मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप लगाया था कि बहू (याचिकाकर्ता) ने उनके बेटे पर पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा देने का दबाव डाल रही थी। मना करने पर उसने व उसके रिश्तेदारों ने कथित तौर पर मेरे बेटे को परेशान किया और झूठा केस दर्ज कराया। इसके चलते बेटे को नौकरी छोड़नी पड़ी और मानसिक तनाव में था। जुलाई 2022 में उसने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।
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कोर्ट ने कहा कि युवक पत्नी की ओर से दायर किए गए मामलों का सामना कर रहा था। वैवाहिक संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं थे। फिर भी प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि आत्महत्या आवेदकों की ओर से दायर मामलों का परिणाम थी। कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के इरादे का कोई साक्ष्य नहीं पाया।
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