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सेवानिवृत्ति लाभ का अधिकार सेवा की अवधि से तय होता है, पद से नहीं : कोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन दशक तक सेवा देने वाले एक सरकारी कर्मचारी के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सेवानिवृत्ति लाभों का अधिकार सेवा की अवधि से तय होता है, पद से नहीं।
कोर्ट ने कहा कि समय तक निर्बाध सेवा लेने के बाद किसी कर्मचारी को उसके पेंशन लाभों से वंचित करना पूर्णतः अनुचित और अमानवीय होगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील पर की। पीलीभीत निवासी याची कनिष्ठ लिपिक (जूनियर क्लर्क) के पद पर कार्यरत था।
याची ने 1997 में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण किया था। 12 सितंबर 1997 को उसे नियुक्ति पत्र दिया गया था। हालांकि, बाद में प्रशासनिक रिपोर्टों का हवाला देते हुए अधिकारियों ने इस आधार पर उसकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं कि नियुक्ति एक नियमित पद के बजाय स्थायी कर्मचारी के लंबी छुट्टी पर जाने से खाली हुए पद पर हुई थी।
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याची ने सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द करने व सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान की मांग में याचिका दायर की। एकल पीठ ने 2012 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद याची ने विशेष अपील दायर की। खंडपीठ ने एकल पीठ के 31 अगस्त 2012 के आदेश को रद्द कर कहा कि राज्य अधिकारियों की त्रुटियों का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी शिकायत के लगभग 30 साल तक निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं दी हैं। चयन प्रक्रिया पूरी होने और लंबी सेवा अवधि के बाद प्रशासनिक खामियों का हवाला देकर किसी कर्मचारी को अनिश्चितता के दौर में धकेलना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
कोर्ट ने अनुच्छेद-226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए संबंधित अधिकारियों को सख्त आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता के पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना एक नियमित सरकारी कर्मचारी के समान करें। साथ ही कोर्ट ने इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर सभी वित्तीय लाभ जारी करने का अंतिम आदेश दिया है।
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कोर्ट ने कहा कि समय तक निर्बाध सेवा लेने के बाद किसी कर्मचारी को उसके पेंशन लाभों से वंचित करना पूर्णतः अनुचित और अमानवीय होगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने बालकृष्ण शर्मा की विशेष अपील पर की। पीलीभीत निवासी याची कनिष्ठ लिपिक (जूनियर क्लर्क) के पद पर कार्यरत था।
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याची ने 1997 में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण किया था। 12 सितंबर 1997 को उसे नियुक्ति पत्र दिया गया था। हालांकि, बाद में प्रशासनिक रिपोर्टों का हवाला देते हुए अधिकारियों ने इस आधार पर उसकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं कि नियुक्ति एक नियमित पद के बजाय स्थायी कर्मचारी के लंबी छुट्टी पर जाने से खाली हुए पद पर हुई थी।
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याची ने सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द करने व सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान की मांग में याचिका दायर की। एकल पीठ ने 2012 में उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद याची ने विशेष अपील दायर की। खंडपीठ ने एकल पीठ के 31 अगस्त 2012 के आदेश को रद्द कर कहा कि राज्य अधिकारियों की त्रुटियों का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगतेगा। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी शिकायत के लगभग 30 साल तक निष्ठापूर्वक अपनी सेवाएं दी हैं। चयन प्रक्रिया पूरी होने और लंबी सेवा अवधि के बाद प्रशासनिक खामियों का हवाला देकर किसी कर्मचारी को अनिश्चितता के दौर में धकेलना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
कोर्ट ने अनुच्छेद-226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए संबंधित अधिकारियों को सख्त आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता के पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना एक नियमित सरकारी कर्मचारी के समान करें। साथ ही कोर्ट ने इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर सभी वित्तीय लाभ जारी करने का अंतिम आदेश दिया है।