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Prayagraj News: गवाहों के मुकरने पर भी मृत्यु पूर्व बयान विश्वसनीय, पति और सास-ससुर की उम्रकैद बरकरार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 24 Oct 2026 02:24 AM IST
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Dying declaration remains credible even if witnesses retract; life sentences for husband and parents-in-law upheld
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कई बार अभियोजन पक्ष के गवाहों को भावनात्मक दबाव, आर्थिक व अन्य लाभ देकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है। ऐसे में केवल गवाहों के मुकर जाने मात्र से ही मृत्यु पूर्व बयान को पूरी तरह अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
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इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने जलने से महिला की मौत के मामले में पति, सास-ससुर की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। हालांकि, कोर्ट ने दो अन्य आरोपियों की पहचान साबित नहीं होने पर उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी।
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अभियोजन के अनुसार बदायूं के उझानी, संजरपुर निवासी संतोष ने बेटी की शादी अनुज के साथ की थी। आरोप था कि चार जनवरी 2017 को ससुरालवालों ने विवाहिता पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां उसी दिन शाम को उसका मृत्यु पूर्व बयान दर्ज किया गया। पांच जनवरी को उसकी मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2018 के आदेश से पति, सास-ससुर व दो अन्य को हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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बचाव पक्ष की दलीलें और कोर्ट का फैसला

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि विवाहिता बयान देने की स्थिति में नहीं थी। इसलिए उसके बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिट्टी के तेल की गंध का उल्लेख नहीं है। मृतका की मां, बहन, मौसी व भाई ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया है। कोर्ट ने डॉक्टर के महिला को बयान देने के लिए फिट घोषित करने के बाद तहसीलदार की ओर से मृत्यु पूर्व बयान दर्ज करने को महत्वपूर्ण माना। इसके आधार पर कोर्ट ने पति अनुज कुमार और सास-ससुर राजेश्वरी व ब्रजपाल की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उनकी अपीलें खारिज कर दीं। वहीं, विपिन और मदन की पहचान साबित नहीं होने व पहचान परेड न कराए जाने के कारण उनकी दोषसिद्धि रद्द कर दी।
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