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रीता जोशी ने पुस्तक में खोला राज :  हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ इंदिरा के कान भरते थे वीपी सिंह और राजेंद्र कुमारी वाजपेयी 

Thu, 21 Apr 2022 07:48 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 21 Apr 2022 07:48 PM IST
सार

हेमवती नंदन बहुगुणा के जीवन पर आधारित किताब में रीता जोशी बताती हैं कि उनके पिता का मानना था कि राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह में देश चलाने का विजन नहीं था। वह कहते थे कि वीपी सिंह कुंठित मानसिकता के हैं और उनमें राष्ट्र चलाने की कूवत नहीं हैं।

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dr Rita Bahuguna Joshi opened the secret in the book VP Singh and Rajendra Kumari Vajpayee used to fill Indira's ears against Hemwati Nandan Bahuguna
prayagraj news : Reeta joshi, mp allahabad - फोटो : prayagraj

विस्तार

प्रयागराज की सांसद और पूर्व मंत्री प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी ने अपने पिता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा की जीवनी पर आधारित अपनी किताब हेमवती नंदन बहुगुणा : भारतीय जनचेतना के संवाहक में सियासत के कई अहम राज खोले हैं।

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डॉक्टर रामनरेश त्रिपाठी के साथ मिलकर लिखी इस किताब में रीता जोशी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अपने पिता के संबंधों में आई खटास के बारे में भी विस्तार से बताया है। उन्होंने बताया है कि पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और राजेंद्र कुमार वाजपेयी उनके पिता के खिलाफ इंदिरा गांधी के कान भरती थीं। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होने वाली रीता जोशी की इस किताब का विमोचन आने वाली तीन मई को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू करेंगे। 
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हेमवती नंदन बहुगुणा के जीवन पर आधारित किताब में रीता जोशी बताती हैं कि उनके पिता का मानना था कि राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह में देश चलाने का विजन नहीं था। वह कहते थे कि वीपी सिंह कुंठित मानसिकता के हैं और उनमें राष्ट्र चलाने की कूवत नहीं हैं। इनको बागडोर मिल गई तो ये राष्ट्र को बर्बाद कर देंगे। रीता लिखती हैं कि वीपी सिंह को कांग्रेस की सदस्यता मेरी मां कमला बहुगुणा ने दिलाई। इंदिराजी से लड़कर उन्हें पहली बार टिकट भी दिलाया था। वह बताती हैं कि दलितों-पिछड़ों के लिए हेमवती नंदन बहुगुणा ने जितनी जमीनों का आवंटन किया, उतना कोई नहीं कर सकता है।

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विनोवा भावे ने कहा था तुम तो मिट्टी नंदन हो

उनके इसी कार्य के चलते एक बार विनोवा भावे ने कहा था कि तुम तो मिट्टी नंदन हो। हेमवतीनंदन बहुगुणा और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संबंधों में आई खटास का जिक्र करते हुए रीता लिखती हैं कि 1980 के चुनाव में पिता ने अपने तीस लोगों के लिए टिकट मांगा लेकिन, इंदिराजी ने इनकार कर दिया। तब कांग्रेस पार्टी पर एक तरह से संजय गांधी का नियंत्रण था और लोग उनके सामने लाइन लगाते थे। बहुगुणाजी बहुत स्वाभिमानी थे और उन्होंने संजय गांधी के आगे लाइन नहीं लगाई।


वह पूरी तरह नेहरू और गांधीवादी थे। 1969 के दौर में जब इंदिराजी सियासत में संघर्ष कर रही थीं तब उन्होंने फोनकर कहा था बहुगुणाजी कुछ करिए। उस समय पिताजी चुनाव हारे थे और उनका पैर टूटा था लेकिन, इसके बाद भी वे दौड़ते रहे और कांग्रेस को मजबूत किया। इमरजेंसी का जिक्र करते हुए रीता बताती हैं कि उस दौर में किसी की बोलने की हिम्मत नहीं थी। बड़े-बड़े नेता जेल में डाल दिए गए थे। तब हेमवती नंदन बहुगुणा ने इंदिराजी को फोन मिलाकर कहा, ये क्या कर दिया।

बहुगुणा इंदिरा के नहीं फांसीवादी के खिलाफ थे

बहुगुणा इंदिरा के खिलाफ नहीं थे बल्कि वे फांसीवादी विचारधार के खिलाफ थे। यही कारण था कि जयप्रकाश नारायण जब संपूर्ण क्रांति के लिए निकले तो बहुगुणाजी ने उनके लिए दरवाजे खोल दिए।  उन्होंने हमेशा पूंजीवाद का विरोध और समाजवाद का समर्थन किया। अपनी इसी विचारधारा के चलते उनका चंद्रभान गुप्ता से वैचारिक मतभेद हुआ। 1980 में उनके कांग्रेस छोड़ने और सांसद पद से इस्तीफा देने से परिवार सहमत नहीं था। वह कांग्रेस को मजबूत कर रहे थे और लोगों को लगा कि वह प्रधानमंत्री बनना चाह रहे थे।  


रीता ने अपनी किताब में पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी और डॉ. संपूर्णानंद के संबंधों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी है। वह बताती हैं कि उनके पिता को राजनीति में आगे बढ़ाने में कमलापति त्रिपाठी का बड़ा योगदान रहा है। कमलापति त्रिपाठी के बाद ही वह यूपी के मुख्यमंत्री बने। उस दौर में जब पीएसी के जवान विद्रोह कर रहे थे तब उन्होंने कमलापति त्रिपाठी की कुर्सी ली।

बहुगुणा कहते थे कि वह नहीं चाहते कि उनके बच्चे राजनीति में आएं

इमरजेंसी के दौरान हुई अपनी शादी का जिक्र करते हुए रीता लिखती हैं कि उस कार्यक्रम में एक भी कांग्रेसी नेता शामिल नहीं हुए था। सिर्फ कमलापति त्रिपाठी आए थे। रीता बताती हैं कि उनके पिता ने कहा था कि मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मेरे बच्चे राजनीति में आएं। यह बहुत कठिन क्षेत्र है लेकिन, मैं जानता हूं कि आप लोग सियासत में आएंगे जरूर। अगर राजनीति में आते हैं तो हमेशा दूरदृष्टि का इस्तेमाल करिएगा। वह आठ साल की उम्र में भी मुझसे राय लेते थे।


उनका मानना था कि हर लड़की को अपने पैर पर खड़ा होना चाहिए। रीता बताती हैं कि उनके पिता अवसरवादी नहीं थे। 1984 में वे चुनाव हार गए थे। इसके बाद कुछ लोगों की तरफ से उन्हें राज्यसभा भेजे जाने का आमंत्रण मिला लेकिन, उन्होंने सीधे इनकार कर दिया। वह समाजवादी और सेक्यूलर विचारधार के थे। रीता बताती हैं कि इस किताब में पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के व्यक्तित्व, संकल्प, आस्थाएं और जो कमियां थीं, उन्हें व्यक्त किया गया है।

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