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जड़े छोड़कर दिल्ली से जा जुड़े डा. जोशी

Thu, 04 Jul 2019 12:48 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 04 Jul 2019 12:48 AM IST
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Dr. Joshi associated with leaving Delhi
Dr. Joshi associated with leaving Delhi - फोटो : CITY DESK
‘प्रयागराज ’ के दूसरे छोर से जा जुड़े डा. जोशी
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0 डा. जोशी के राजनीतिक संघर्षों का गवाह रहा है ‘अंगीरस’
0 1954 में प्रो. के बनर्जी ने डा. जोशी को बंगला करवाया था एलॉट
प्रयागराज। मूलत: प्रयागराज में रचे बसे डा. मुरली मनोहर जोशी का राजनीतिक व्यस्ताओं के चलते बराबर दिल्ली आना जाना लगा रहता था। इलाहाबाद जंक्शन से नई दिल्ली जाने वाली प्रयागराज एक्सप्रेस उनके लिए इलाहाबाद और दिल्ली के बीच किसी सेतु की तरह थी। लेकिन, अब वह इलाहाबाद से विदा लेने के बाद प्रयागराज एक्सप्रेस के दूसरे छोर यानी स्थायी रूप से दिल्ली जा बसेंगे। 69 साल बाद उन्होंने प्रयागराज शहर से अपना नाता पूरी तरह से तोड़ लिया। बुधवार को टैगोर टाउन स्थित अपना बंगला बेेचने के बाद डा. जोशी का तकरीबन सात दशक से लंबा राजनीतिक जीवन और उनके संघर्ष का साक्षी रहा प्रयागराज से भौतिक संबंध भी टूट गया।

टैगोर टाउन स्थित डा. मुरली मनोहर जोशी का 973.34 वर्ग मीटर में बना बंगला ‘अंगीरस’ उनके राजनैतिक संघर्षों का गवाह रहा है। डा. जोशी ने सीधे तौर पर इस बंगले पर अपने 50 साल गुजारे। इसी बंगले से प्रयागराज को उन्होंने एक नई दिशा दी। मेरठ से बीएससी करने के बाद डा. जोशी ने वर्ष 1951 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग में एमएससी में प्रवेश लिया। दो वर्ष 1953 में उन्होंने एमएससी भी कर ली। इसी दौरान वे प्रो. के बनर्जी के संपर्क में आए। तब प्रो. बनर्जी ‘अंगीरस’ बंगले में ही रहा करते थे। उस समय बंगला सरकारी था। 1954 में जब प्रो. बनर्जी कोलकाता जाने ले तो डा. जोशी ने जिला प्रशासन से वार्ता कर बंगला एलॉट करवा लिया। हर महीने वे इसका जिला प्रशासन को निर्धारित किराया भी देते थे। बाद में यह बंगला उन्होंने खरीद लिया। इस बीच वे 1960 में नियमित शिक्षक भी हो गए। 1993 में डा. जोशी ने अपने इस बंगले को नया लुक दे दिया। इसके बाद वे 1996, 1998 एवं 1999 में लगातार तीन बार इलाहाबाद संसदीय सीट से सांसद निर्वाचित हुए। लेकिन वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद उन्होंने प्रयागराज से दूरी बना ली। इसके बाद वे यहां कम आने लगे। प्रयागराज के बाद वाराणसी और उसके बाद कानपुर को उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। हालांकि वे ज्यादा समय दिल्ली में ही व्यतीत करते हैं। वहीं उनकी दोनों बेटियां प्रियबंदा और निवोदिता भी रहती हैं।
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