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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   diwali 2020: there is no history of firecrackers on diwali

diwali 2020 : दीपावली पर पटाखों की गूंज का नहीं है कोई इतिहास, मुगलों तथा अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान आतिशबाजी का था चलन

Mon, 02 Nov 2020 07:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 02 Nov 2020 07:45 PM IST
सार

अकबर के काल में न केवल आतिशबाजी आई, बल्कि शहर कोतवाल और दरोगा-ए-आतिश (तोपखाने का दरोगा) उत्सव तथा युद्ध की आतिशबाजियों के स्तर को नियंत्रित भी करता था। मुगलों तथा अंग्रेजों दोनों के काल में आतिशबाजी का चलन विजयोत्सव से जुड़ा, बाद में धीरे-धीरे यह चलन दीपावली से जुड़ गया।
प्रो.हेरंब चतुर्वेदी - डीन कला संकाय तथा पूर्व अध्यक्ष, मध्यकालीन इतिहास विभाग, इलाहाबाद विवि।

आतिशबाजी का कहीं उल्लेख नहीं

दीपावली उत्सव की शुरुआत लंका विजय के पश्चात भगवान राम के अयोध्या लौटने पर हुई थी। तब अयोध्या में दीपों से घर सजाए गए थे। लेकिन पर्व पर आतिशबाजी की शुरुआत कब से शुरू हुई, इसका कहीं स्पष्ट उल्लेख नहीं है। - प्रो. राम सेवक दुबे - पूर्व चीफ प्रॉक्टर इविवि संस्कृत विभाग

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diwali 2020: there is no history of firecrackers on diwali
prayagraj news : fireworks - फोटो : prayagraj

विस्तार

भले ही दीपावली दीपक जलाने का उत्सव है, किंतु हर साल बगैर पटाखे फोड़े बिना यह त्योहार संपन्न नहीं होता। लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर भगवान श्री राम के स्वागत में घर-घर दीपों की मालाएं सजाई गईं थीं, तब से दीपोत्सव शुरू हो गया। लेकिन त्योहार पर आतिशबाजी चलाने की परंपरा कब से पड़ी, यह लोगों के लिए आज भी अबूझ पहेली बना हुआ है। 

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diwali 2020: there is no history of firecrackers on diwali
prayagraj news : fireworks - फोटो : prayagraj

इतिहासकारों के मुताबिक ईसा पूर्व रचित कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक ऐसे चूर्ण का जरूर विवरण है, जोकि तेजी से जलता था। लेकिन बारूद की बात की जाए तो इसका आविष्कार चीन में हुआ था। पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने तीन रसायनों को मिलाकर कागज़ में लपेट कर ‘फायर पिल’ बनाई थी, वहीं यूरोप में पटाखों का चलन सबसे पहले वर्ष 1258 में हुआ था।

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prayagraj news - फोटो : prayagraj
यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया था। पश्चिमी देशों ने बम बनाए, बंदूकें और तोप भी बनीं। जब बाबर ने वर्ष 1526 में भारत पर आक्रमण किया, तो वह बारूदी तोपें लेकर आया था। बाद में अकबर के शासनकाल में आतिशबाजी का प्रचलन अस्तित्व में आया। अंग्रेजी हुकूमत में महाराजा चार्ल्स पंचम अपनी सभी जीत का जश्न आतिशबाज़ी करके मनाते थे। पहले राजा, धनाढ्य ही आतिशबाजी के शौकीन थे, बाद में आम जनता में भी पटाखे फोड़ने का चलन शुरू हुआ। 

अप्रैल 1667 में लगी थी पटाखों पर रोक

पहली बार 8 अप्रैल, 1667 को औरंगजेब के आदेश पर पटाखों के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई थी। बीकानेर के पूर्व राजा महाराजा गंगा सिंह ने इसका समर्थन करते हुए एक्ट का मसौदा तैयार किया, जिसमें उत्सव के लिए पटाखे का इस्तेमाल न करने को कहा गया था।

शिवकाशी में बनती है आतिशबाजी

तमिलनाडु में स्थित शिवकाशी ऐसा शहर है, जोकि पटाखों के शहर के नाम से जाना जाता है। इसे यह दर्जा दिलाने का श्रेय पी अय्या नादर और उनके भाई शनमुगा नादर को है। दोनों भाई वर्ष 1923 में दियासलाई बनाने की विधि सीखने के लिए कोलकाता गये थे। वहां से लौटकर उन्होंने आतिशबाजी बनाने की भी शुरुआत की। आंकड़ों के अनुसार शिवकाशी में तकरीबन 8,000 बड़े और छोटे कारखाने हैं, जिनमें देश के कुल 90 प्रतिशत पटाखों का उत्पादन होता है।
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