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मसीही बने धर्मवीर भारती के बेटे किंशुक
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 25 Dec 2016 01:40 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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‘गुनाहों का देवता’ जैसी कालजयी कृति के प्रणेता प्रख्यात कवि-नाटककार धर्मवीर भारती होते तो इस क्रिसमस पूरे नब्बे बरस के होते। एक ओर जब पूरा देश क्रिसमस की खुशियां मना रहा है, भारती परिवार के लिए भी क्रिसमस खुशियों की सौगातें लेकर आया है। संभवत: कम लोगों को ही पता होगा कि भारती परिवार और क्रिसमस का करीबी नाता है। बीते दिनों भारती जी के बेटे किंशुक भारती ने जब ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया तो यह रिश्ता और मजबूत हो गया।
क्रिसमस की छुट्टियां बिताने भारत आए अमेरिका के साउथ कैरोलिना में केमिकल इंजीनियर किंशुक के संग खुशियां सहेज रहीं पुष्पा भारती ने बातचीत में ‘अमर उजाला’ से भी क्रिसमस और भारती परिवार के रिश्ते को साझा किया। बोलीं, पूरी दुनिया के साथ ही अपने देश में भी क्रिसमस की रौनक है लेकिन मेरे लिए यह और भी खास है क्योंकि अबकी मेरा बेटा यहां क्रिसमस की खुशियां संग मनाने आया है।
कितनी अजीब बात है कि भारती जी क्रिसमस के दिन पैदा हुए। मां कहती थीं, वर्ष 1935 में गंगा दशहरा के दिन जब अस्पताल में मेरी पहली आवाज निकली, तो पड़ोस के चर्च में घंटे बज रहे थे। मैंने जीवन में पहली बार क्राइस्ट का पेंडेंट ही पहना था। मैंने अनायास ही उसे पसंद किया और मां ने भी उसे दिला दिया। किंशुक अमेरिका में सभी धर्मस्थलों, मंदिरों में भी गया लेकिन उसे ईसाई धर्म में सबसे कम आडंबर दिखा, सो उसने उसे अपना लिया।
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भारती जी स्वयं को भले ही नास्तिक मानते थे, लेकिन वह बहुत धर्मप्राण थे। भागवत तो उनका सबसे प्रिय ग्रंथ था। साथी कहते थे, उनके साथ बैठ जाओ तो ऐसा लगता जैसे चार किताबें पढ़ कर उठे हों। कनुप्रिया की आलोचना में तो पंडित माखन लाल चतुर्वेदी ने लिखा था, ‘एक नास्तिक वैष्णव की राधा कनुप्रिया।’ वर्ष 1955-56 में कोलकता युनिवर्सिटी के एक कॉलेज में अध्यापन के दौरान भारती जी मुझे प्रतिदिन खत लिखते थे। अपनी अंतरंगता में उन्होंने मुझे कच्ची मिट्टी की तरह पाया था, जिसे वह बाइबिल का उदाहरण देकर करुणा और प्रेम का अर्थ समझाते थे। ऐसे में हम अनजाने ही क्राइस्ट के करीब आ गए। आज भारती जी के जन्मदिन पर अपने सभी ईसाई मित्रों को बधाई देने का मन करता है।
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क्रिसमस की छुट्टियां बिताने भारत आए अमेरिका के साउथ कैरोलिना में केमिकल इंजीनियर किंशुक के संग खुशियां सहेज रहीं पुष्पा भारती ने बातचीत में ‘अमर उजाला’ से भी क्रिसमस और भारती परिवार के रिश्ते को साझा किया। बोलीं, पूरी दुनिया के साथ ही अपने देश में भी क्रिसमस की रौनक है लेकिन मेरे लिए यह और भी खास है क्योंकि अबकी मेरा बेटा यहां क्रिसमस की खुशियां संग मनाने आया है।
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कितनी अजीब बात है कि भारती जी क्रिसमस के दिन पैदा हुए। मां कहती थीं, वर्ष 1935 में गंगा दशहरा के दिन जब अस्पताल में मेरी पहली आवाज निकली, तो पड़ोस के चर्च में घंटे बज रहे थे। मैंने जीवन में पहली बार क्राइस्ट का पेंडेंट ही पहना था। मैंने अनायास ही उसे पसंद किया और मां ने भी उसे दिला दिया। किंशुक अमेरिका में सभी धर्मस्थलों, मंदिरों में भी गया लेकिन उसे ईसाई धर्म में सबसे कम आडंबर दिखा, सो उसने उसे अपना लिया।
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भारती जी स्वयं को भले ही नास्तिक मानते थे, लेकिन वह बहुत धर्मप्राण थे। भागवत तो उनका सबसे प्रिय ग्रंथ था। साथी कहते थे, उनके साथ बैठ जाओ तो ऐसा लगता जैसे चार किताबें पढ़ कर उठे हों। कनुप्रिया की आलोचना में तो पंडित माखन लाल चतुर्वेदी ने लिखा था, ‘एक नास्तिक वैष्णव की राधा कनुप्रिया।’ वर्ष 1955-56 में कोलकता युनिवर्सिटी के एक कॉलेज में अध्यापन के दौरान भारती जी मुझे प्रतिदिन खत लिखते थे। अपनी अंतरंगता में उन्होंने मुझे कच्ची मिट्टी की तरह पाया था, जिसे वह बाइबिल का उदाहरण देकर करुणा और प्रेम का अर्थ समझाते थे। ऐसे में हम अनजाने ही क्राइस्ट के करीब आ गए। आज भारती जी के जन्मदिन पर अपने सभी ईसाई मित्रों को बधाई देने का मन करता है।