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देवेश मिश्रा : क्रिकेट के हीरों को तराशने वाले जौहरी सोमवार को हो रहे सेवानिवृत्त, कैफ ने लिया है प्रशिक्षण

Fri, 28 Jul 2023 11:47 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 28 Jul 2023 11:47 AM IST
सार

दारागंज में स्थित नागवासुकि मंदिर के पास रहने वाले देवेश को बचपन से ही क्रिकेट का खेल सबसे ज्यादा भाया। पिता शेषनारायण मिश्रा राजकीय कार्यालय निरीक्षणालय में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे। देवेश बताते हैं कि वह क्रिकेट शौक के लिए खेलते थे।

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Devesh Mishra: The innings of AU's cricket coach who honed the talents of Prayagraj is over, retiring on Monda
देवेश मिश्र। क्रिकेट कोच, इलाहाबाद विश्वविद्यालय। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्रयागराज में क्रिकेट को अर्श तक पहुंचाने में अतुलनीय भूमिका निभाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के क्रिकेट कोच देवेश मिश्रा सोमवार को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं। सीमित संसाधनों में क्रिकेटरों की प्रतिभा को पहचानकर उनमें निखार लाने वाले देवेश मिश्रा बतौर कोच बेहद सफल रहे हैं, उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करके मो. कैफ ने जहां भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई है, वहीं कैफ के अलावा अली मुर्तजा और शलभ श्रीवास्तव ने आईपीएल तक का सफर तय किया है। इसके अलावा दर्जनों क्रिकेटर विभिन्न विभागों में क्रिकेट कोटे से नौकरी भी कर रहे हैं। देवेश ने बतौर प्रशिक्षक के रूप में शहर में अपना एक अलग मुकाम स्थापित किया है। 

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दारागंज में स्थित नागवासुकी मंदिर के पास रहने वाले देवेश को बचपन से ही क्रिकेट का खेल सबसे ज्यादा भाया। पिता स्व. शेषनारायण मिश्रा राजकीय कार्यालय निरीक्षणालय में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे। देवेश बताते हैं कि वह क्रिकेट शौक के लिए खेलते थे। उनके ही मोहल्ले में तत्कालीन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कप्तान और यूपी टीम के सदस्य हसन नसीब दारा भी रहा करते थे।

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हसन नसीब ने ही उन्हें प्रोफेशनल स्तर पर क्रिकेट को खेलने की सलाह दी और पिता को भी मनाया। यहीं से क्रिकेट की शुरुआत हुई। वर्ष 1980 में कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में अंडर-16 वर्ग के प्रदेश भर के 40 बच्चों के लिए 21 दिन का कैंप लगाया गया, जिसमें उनका चयन हुआ। इसी कैंप के बाद कानपुर के स्पोर्ट्स हास्टल में उनका चयन हुआ। वर्ष 1989 में स्नातक पूरा करने के बाद 1990 में एनआईएस में दाखिला लिया और कोचिंग की दिशा में कदम रख दिया। इसके बाद 1992 में मदन मोहन मालवीय स्टेडियम में बतौर प्रशिक्षक जुड़ गए। 

स्टेडियम में जुड़ने के बाद वह क्रिकेटरों को तराशने और निखारने के काम में जुट गए। 1994 में स्टेडियम की जो टीम तैयार की, उसमें केबी काला कप्तान बनाए गए और आशीष विस्टन जैदी जैसे दिग्गज खिलाड़ी उनकी टीम का हिस्सा बने। वहीं 1993 में ही उनसे प्रशिक्षण प्राप्त करने लिए मो. कैफ भी पहुंचे, महज एक साल का प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ही कैफ का चयन कानपुर के स्पोर्ट्स कॉलेज में हो गया। देवेश का कहना है कि स्टेडियम में कोच की भूमिका बस इतनी ही होती है कि वह खिलाड़ियों को इस लायक तैयार कर दे कि खिलाड़ी का चयन स्पोर्टस कॉलेज या हास्टल में हो जाए। 

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देवेश मिश्रा कहते हैं कि भगवान ने उन्हें सबसे खास चीज जो दी है वह यह है कि वह खिलाड़ियों के खेल को देखकर उसकी क्षमता का आकलन बड़ी तेजी के साथ कर लेते हैं। यही वजह है कि जिस खिलाड़ी में उन्हें क्षमता दिखाई देती थी उसे ही वह अपनी टीम में शामिल करते थे। देवेश ने जिन खिलाड़ियों के हुनर को पहचान कर उन्हें आगे बढ़ने की नसीहत की उनमें से कई खिलाड़ी बेहद सफल हुए।

इनमें मो. कैफ के अलावा आसिफ मुर्तजा (रेलवे), अस्करी अब्बास (एजीयूपी), अनूप सिंह (रेलवे), रितेश जायसवाल (एजीयूपी) शामिल हैं। इसके अलावा वर्ष 2015-16 में यश दयाल भी इलाहाबाद विश्विविद्यालय की टीम में जुड़े तो देवेश ने उन्हें भी प्रशिक्षित किया। वहीं देवेश के प्रशिक्षु रह चुके शलभ श्रीवास्तव ने अंडर-19 वर्ल्ड कप और शलभ व अली मुर्तजा ने आईपीएल तक का सफर तय किया। देवेश के बेटे प्रथम मिश्रा भी क्रिकेट कोटे से रेलवे में नौकरी कर रहे हैं। 

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इलाहाबाद विश्विविद्यालय में क्रिकेट को उबारा

इविवि में वर्ष 1995 से ही क्रिकेट का खेल बंद चल रहा था। क्रिकेट मैदान पर होने वाली लड़ाई, गुंडई और बाहरी लोगों की ओर से फैलाई जा रही अराजकता के चलते क्रिकेट को बंद कर दिया गया था। वर्ष 2002 में इविवि में बतौर क्रिकेट कोच जुड़ने के बाद क्रिकेट पर काम करना शुरू किया और 2005 में खेल को दुबारा से शुरू कराया। सात साल के बाद विश्वविद्यालय में क्रिकेट शुरू हुआ तो कई बेहतरीन खिलाड़ी निकले। 

यह है सपना 

देवेश मिश्रा का सपना है कि शहर में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम हो, ताकि नए खिलाड़ी बड़े मैचों को देखकर उस माहोल को समझ पाएं। वहीं सुरक्षित मैदान और सामान्य स्तर की सुविधा में वह बच्चों को क्रिकेट का प्रशिक्षण देकर बड़े स्तर तक पहुंचाए। इसके लिए वह प्रयासरत हैं। वहीं देवेश कहते हैं कि उनका एक सपना ये भी था कि स्टेडियम में एथलेटिक्स के खिलाड़ियों के लिए सिंथेटिक ट्रैक की व्यवस्था हो जोकि पूरा होने की ओर है। 

समय है सबसे महत्वपूर्ण 

देवेश मिश्र को समय और अनुशासन से बड़ा लगाव है। उनका कहना है कि मैदान हो या फिर कोई अन्य जगह, जहां भी पहुंचना हो वह निर्धारित समय से 10-15 मिनट पहले ही पहुंच जाया करते हैं। देवेश का मानना है कि किसी भी खिलाड़ी या शख्स को समयसीमा का ख्याल तो हमेशा ही रखना चाहिए। इसकी सलाह वह सभी खिलाड़ियों को देते हैं।

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