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मेडिकल जांच से इन्कार पर पीड़िता को मुआवजे से वंचित करना असांविधानिक : हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यौन हिंसा की पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए सहमति देने से इन्कार करने पर रानी लक्ष्मीबाई महिला व बाल सम्मान कोष के तहत आर्थिक सहायता से वंचित करना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। कोर्ट ने योजना की अनिवार्य इंजरी रिपोर्ट संबंधी शर्त को असांविधानिक घोषित करते हुए राज्य सरकार को 10 दिन में आठ वर्षीय पीड़िता को तीन लाख रुपये की सहायता देने का निर्देश दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया।
जौनपुर के शाहगंज थाने में 28 जनवरी 2024 को घटना की एफआईआर दर्ज की गई थी। आठ मार्च 2024 को पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। लेकिन, उसने विशेष जांच की सहमति नहीं दी। इसके चलते इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं की जा सकी। 20 मार्च 2024 को आरोपपत्र दाखिल हुआ और आरोपी गिरफ्तार किया गया। हालांकि मुकदमे का ट्रायल अभी लंबित है।
योजना के तहत सहायता के लिए एफआईआर, आरोपपत्र और दुष्कर्म दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य थी। इसी आधार पर जिला स्तरीय समिति ने पीड़िता का दावा खारिज कर दिया था। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट में अपराध साबित करने के लिए दिखाई देने वाली चोट जरूरी नहीं है। कानून मेडिकल जांच के लिए सहमति के अधिकार को भी संरक्षित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी टू-फिंगर टेस्ट को गरिमा के विरुद्ध माना है। मेडिकल रिपोर्ट की अनुपलब्धता सहायता रोकने का पूर्ण आधार नहीं हो सकती।
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जौनपुर के शाहगंज थाने में 28 जनवरी 2024 को घटना की एफआईआर दर्ज की गई थी। आठ मार्च 2024 को पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। लेकिन, उसने विशेष जांच की सहमति नहीं दी। इसके चलते इंजरी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं की जा सकी। 20 मार्च 2024 को आरोपपत्र दाखिल हुआ और आरोपी गिरफ्तार किया गया। हालांकि मुकदमे का ट्रायल अभी लंबित है।
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योजना के तहत सहायता के लिए एफआईआर, आरोपपत्र और दुष्कर्म दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट अनिवार्य थी। इसी आधार पर जिला स्तरीय समिति ने पीड़िता का दावा खारिज कर दिया था। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
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कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट में अपराध साबित करने के लिए दिखाई देने वाली चोट जरूरी नहीं है। कानून मेडिकल जांच के लिए सहमति के अधिकार को भी संरक्षित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी टू-फिंगर टेस्ट को गरिमा के विरुद्ध माना है। मेडिकल रिपोर्ट की अनुपलब्धता सहायता रोकने का पूर्ण आधार नहीं हो सकती।