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फूलपुर के दंगल में राष्ट्रवाद के साथ दिखी जातिगत गोलबंदी
Mon, 13 May 2019 01:40 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 13 May 2019 01:40 AM IST
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keshari devi
- फोटो : प्रयागराज
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फूलपुर संसदीय सीट में इस बार हवा की इबारत पढ़ना मुश्किल नजर आ रहा है। इस लोकसभा के दंगल में जहां शहर की दो विधानसभा सीटों पर राष्ट्रवाद दिखा तो वहीं ग्रामीण अंचल की तीनों विधानसभा सीटों पर जातिगत गोलबंदी दिखी। दोनों फैक्टर मतदाताओं के सिर चढ़कर बोले और मतदान में पिछले चुनाव के मुकाबले वोटिंग प्रतिशत भी कुछ बढ़ा। अब सभी को इंतजार 23 मई का है।
भाजपा और महागठबंधन दोनों के ही उम्मीदवारों के लिए फूलपुर की जमीन नई नहीं है। केसरी देवी कई बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं तो पंधारी भी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष के तौर पर जमीन से जुड़े रहे हैं। इन दो दिग्गजों के शोर में कांग्रेस उम्मीदवार कहीं गुम हो गए। साथ ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी फूलपुर सीट को ज्यादा तरजीह नहीं दी। कोई भी बड़ा कांग्रेसी नेता यहां प्रचार तक के लिए नहीं आया। हालांकि कृष्णा पटेल के दामाद की पूरी रणनीति पटेल बाहुल्य क्षेत्र के इन्ही मतदाताओं के इर्दगिर्द घूमती रही। भाजपा को उम्मीद है कि उसे वर्ष 2014 जैसी विजयश्री मिले, जबकि गठबंधन पिछले उपचुनाव में भाजपा को पराजित कर चुका है। इस बार भी गठबंधन को उपचुनाव की पुनरावृत्ति का दावा कर रहा है।
पटेल, मौर्य बिरादरी के वोटों के साथ ही केशरीदेवी को राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दों का भी सहारा है। शहरी युवा मतदाताओं में राष्ट्रवाद का जोश है। सवर्णों को सर्जिकल स्ट्राइक , आतंकवाद पर नकेल कसने के मुद्दों पर लुभाने के अलावा भाजपा ने किसानों को खाते में दो हजार रुपये डालकर भी साधने की उम्मीद है। सड़क, बिजली, गरीबों को आवास, उज्जवला जैसी योजनाओें से भी भाजपा को अपनी जीत पक्की दिख रही है।
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भाजपा समर्थक युवा अधिवक्ता राजेश खरे कहते हैं कि मोदी ने राष्ट्र को एक नई पहचान दी है। इसलिए भाजपा का दुबारा सत्ता में लौटना जरूरी है। वहीं मंसूराबाद सम्हई के किसान गया प्रसाद त्रिपाठी कहते हैं कि भाजपा सरकार में विकास हुआ है। अब गांव में 18 घंटे बिजली मिलती है। सड़कें भी बेहतर हो गई हैं। किसानों के लिए भी भाजपा ने काफी कुछ किया है। भाजपा को इस बार विकास के सहारे जीत की उम्मीद है।
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भाजपा और महागठबंधन दोनों के ही उम्मीदवारों के लिए फूलपुर की जमीन नई नहीं है। केसरी देवी कई बार जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं तो पंधारी भी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष के तौर पर जमीन से जुड़े रहे हैं। इन दो दिग्गजों के शोर में कांग्रेस उम्मीदवार कहीं गुम हो गए। साथ ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी फूलपुर सीट को ज्यादा तरजीह नहीं दी। कोई भी बड़ा कांग्रेसी नेता यहां प्रचार तक के लिए नहीं आया। हालांकि कृष्णा पटेल के दामाद की पूरी रणनीति पटेल बाहुल्य क्षेत्र के इन्ही मतदाताओं के इर्दगिर्द घूमती रही। भाजपा को उम्मीद है कि उसे वर्ष 2014 जैसी विजयश्री मिले, जबकि गठबंधन पिछले उपचुनाव में भाजपा को पराजित कर चुका है। इस बार भी गठबंधन को उपचुनाव की पुनरावृत्ति का दावा कर रहा है।
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पटेल, मौर्य बिरादरी के वोटों के साथ ही केशरीदेवी को राष्ट्रवाद और विकास के मुद्दों का भी सहारा है। शहरी युवा मतदाताओं में राष्ट्रवाद का जोश है। सवर्णों को सर्जिकल स्ट्राइक , आतंकवाद पर नकेल कसने के मुद्दों पर लुभाने के अलावा भाजपा ने किसानों को खाते में दो हजार रुपये डालकर भी साधने की उम्मीद है। सड़क, बिजली, गरीबों को आवास, उज्जवला जैसी योजनाओें से भी भाजपा को अपनी जीत पक्की दिख रही है।
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भाजपा समर्थक युवा अधिवक्ता राजेश खरे कहते हैं कि मोदी ने राष्ट्र को एक नई पहचान दी है। इसलिए भाजपा का दुबारा सत्ता में लौटना जरूरी है। वहीं मंसूराबाद सम्हई के किसान गया प्रसाद त्रिपाठी कहते हैं कि भाजपा सरकार में विकास हुआ है। अब गांव में 18 घंटे बिजली मिलती है। सड़कें भी बेहतर हो गई हैं। किसानों के लिए भी भाजपा ने काफी कुछ किया है। भाजपा को इस बार विकास के सहारे जीत की उम्मीद है।
pandhari yadav
- फोटो : प्रयागराज
महागठबंधन प्रत्याशी पंधारी यादव को जातीय समीकरण का सहारा है। रोजगार, राफेल और नोटबंदी जैसे मुद्दों का मतदाताओं पर वैसा असर नहीं दिख रहा है जैसी गठबंधन को उम्मीद थी। मगर दलित, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं का जोर काम किया तो गठबंधन की रणनीति सफल हो सकती है। नवाबगंज के रामकुशल का कहना है कि भाजपा के कार्यकाल में बेरोजगारी बढ़ी है। किसानों की समस्याओं का कोई हल नहीं निकला है। वहीं लालगोपालगंज के गयासुद्द्ीन कहते हैं कि मुस्लिम मतदाता महागठबंधन के साथ हैं। सपा बसपा के परंपरागत मतदाओं के अलावा इस बार के चुनाव में अन्य पिछड़ावर्ग निषाद, पाल जैसी जातियों के मतदाताओं में भी बिखराव दिखा। अन्य पिछड़ा वर्ग पिछले चुनाव में भाजपा से जुड़ा था। इस बार उसमें बिखराव से महागठबंधन को फायदा मिल सकता है।
कभी पंडित नेहरू की संसदीय सीट रही फूलपुर से इस बार कांग्रेस ने लगभग किनारा ही कर लिया है। कांग्रेस ने निरंजन पटेल को इस सीट से उतारा मगर राहुल या प्रियंका दोनों ही प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार करने नहीं आए। पार्टी के प्रचार की कमान अजहरुद्दीन और हार्दिक पटेल तक ही सिमट कर रह गई। मतदाताओं के बीच भी कांग्रेस को लेकर उत्साह नजर नहीं आया और आम मतदाता उनको वोट कटवा की भूमिका में ही देखते रहे।
कभी पंडित नेहरू की संसदीय सीट रही फूलपुर से इस बार कांग्रेस ने लगभग किनारा ही कर लिया है। कांग्रेस ने निरंजन पटेल को इस सीट से उतारा मगर राहुल या प्रियंका दोनों ही प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार करने नहीं आए। पार्टी के प्रचार की कमान अजहरुद्दीन और हार्दिक पटेल तक ही सिमट कर रह गई। मतदाताओं के बीच भी कांग्रेस को लेकर उत्साह नजर नहीं आया और आम मतदाता उनको वोट कटवा की भूमिका में ही देखते रहे।