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UP: गरीबी से जूझ रहे दंपति ने ट्रेन से कटकर दी जान

Mon, 13 Nov 2017 11:38 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Mon, 13 Nov 2017 11:38 AM IST
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The poverty-stricken couple has been cut off by the train
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
 तंगी और अकेलेपन से जूझ रहे करछना इलाके के दंपति ने रविवार भोर में औद्योगिक क्षेत्र स्थित कोटिया गांव के समीप ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। सुबह ग्रामीणों ने शव देखे तो वहां भीड़ लग गई और पुलिस पहुंची। औद्योगिक क्षत्र पुलिस ने मौके पर जांच के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
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करछना के भटेवरा सोनाई गांव का राजेंद्र प्रसाद (50) पत्नी रामरती (45) के साथ बेहद तकलीफ में गुजर-बसर कर रहा था। उन दोनों की कोई संतान नहीं थी। माता-पिता के अलावा राजेंद्र की दो बहनों का भी देहांत हो गया था। राजेंद्र पहले इंदौर में एक प्राइवेट कंपनी में कर्मचारी था। लगभग 15 साल पहले दुर्घटना में उसका एक पैर कट गया।
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दुर्घटना बीमा से मिले पैसे लेकर वह यहां घर पर पत्नी के साथ गुजारा करने लगा। बीमा के पैसे खत्म होने पर वह उसने गांव के चार समूहों से कर्ज ले लिया। लगभग एक लाख रुपये कर्ज हो गया था। मगर वह किश्त भी नहीं चुकता कर पा रहा था। पड़ोसियों के मुताबिक, सोमवार को वह घर में ताला लगाकर पत्नी रामरती के साथ कहीं चला गया था। जाते समय पड़ोसियों से बोला था कि वे दोनों इंदौर जा रहे हैं। फिर एक हफ्ते तक उन दोनों के बारे में पता नहीं चला।
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रविवार भोर में औद्योगिक क्षेत्र में कोटिया गांव के पास दिल्ली-हावड़ा रेलमार्ग के डाउन ट्रैक पर उन दोनों के क्षतविक्षत शव देख ग्रामीण सन्न रह गए। भीड़ लगी तो खबर पाकर पुलिस पहुंची। पुलिस को राजेंद्र की जेब में आधार कार्ड मिला। परिवार का कोई शख्स था नहीं। पुलिस ने दोनों शव सीलकर चीरघर भेज दिए।

गरीबी से जूझ रहे राजेंद्र ने चार समितियों से कर्ज लिया था ताकि जीवन यापन हो सके। मगर वह किश्त नहीं जमा कर पा रहा था। ऐसे में कर्ज देने वाली समितियों की ओर से उस पर दबाव बनाया जा रहा था। ऐसे में दंपति की खुदकुशी का यह भी एक कारण हो सकता है। गांवों में मजदूर तबके की महिलाओं को समूह के रूप में प्राइवेट बैंक ऋण देते हैं।

महिलाएं किसी स्वरोजगार के तहत काम कर कर्ज चुकाती रहती हैं। यदि एक भी किश्त नही दें सकीं तो समूह के लोग कर्ज वापसी का दबाव बनाने लगते हैं। ऐसे में ग्रामीण महिलाएं समूह का ऋण चुकाने के लिए साहूकारों से ऊंचे दर पर ऋण ले लेती हैं। यदि उस सीजन में काम नहीं मिला तो एक तरफ समूह का दबाव और दूसरी ओर साहूकारों का दबाव भी हावी हो जाता है। ऐसे में ग्रामीण भागने और आत्महत्या के लिए मजबूर होते हैं।


करछना के भटेवरा गांव निवासी राजेंद्र प्रसाद माता-पिता का इकलौता पुत्र था। उसके पिता राम अभिलाष भी घर में इकलौते थे। उनके पास कोई खेत या जमीन नहीं थी। रहने के लिए सिर्फ एक खपरैलनुमा मकान था। वो भी करीब दो दशक पहले राज्य सरकार द्वारा अनुदान में मिला था। तत्कालीन सरकार ने उन्हें मकान बनवाने के लिए 20 हजार रुपये दिए थे पर मकान में प्लास्टर तक नहीं हो सका था। इंदौर में हुई दुर्घटना में अपना एक पैर गंवाने के बाद क्लेम में मिले पैसे से ही इसने दो साल पहले शौचालय और एक हैंडपंप लगवाया था। गरीबी पर तरस खाकर कोटेदार उन्हें निर्धारित मात्रा से ज्यादा खाद्यान्न दे देते थे।
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