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शास्त्रीय गायक पद्मभूषण पंडित राजन मिश्र का प्रयागराज से था गहरा लगाव

Mon, 26 Apr 2021 12:22 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 26 Apr 2021 12:22 AM IST
सार

वह बहुत बड़े कलाकार थे। उनका जाना संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। यह मेरे लिए सुखद रहा कि मेरे कार्यकाल में वर्ष 2013 में हुए तानसेन समारोह में उन्हें ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा गया था। उन्होंने प्रयागराज में भी कई शिष्य बनाए। - प्रो.स्वतंत्रबाला शर्मा, पूर्व कुलपति, राजा मानसिंह तोमर विवि

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Classical singer Padmabhushan Pandit Rajan Mishra had a deep affection for Prayagraj
पद्मभूषण पं. राजन मिश्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोना ने एक नामचीन कलाकार को हमसे छीन लिया। उपचार के दौरान नई दिल्ली के एक अस्पताल में रविवार को प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित राजन मिश्र ने अंतिम सांस ली। उनकी सांसें थमीं तो प्रयागराज का संगीत जगत स्तब्ध रह गया। प्रयागराज से भी उनका करीबी नाता रहा। पूर्व महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह के यहां वैवाहिक समारोह सहित यहां के किसी भी निमंत्रण पर वह आना नहीं भूले। कहते थे, सुधी श्रोताओं के बीच यहां बार-बार आना सुखद लगता है। पिछली बार बीते महाकुंभ के दौरान 16 फरवरी 2019 को स्पिक  मैके के मंच पर आए तो राग मारू बिहाग, राग झिंझोटी में ख्याल गायकी के बाद उन्होंने भजन ‘मैं न जिऊं बिन राम’ सुनाया था।

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Classical singer Padmabhushan Pandit Rajan Mishra had a deep affection for Prayagraj
पद्मभूषण पंडित राजन साजन मिश्र। - फोटो : अमर उजाला
छह फरवरी 2011 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के न्योते पर व्याख्यान-प्रदर्शन के लिए आए पंडित राजन मिश्र ने कहा था, अगली बार आए तो पूरे तीन घंटे तक भैरवी ही सुनाएंगे। इस दौरान उन्होंने एक ताल में निबद्ध रचना ‘कगवा बोले, पिया के सगुन विचार’ सुनाकर समां बांधने के बाद मध्यलय तीन ताल, छोटा ख्याल में ‘गुंद, गुंद लायो मालिनिया’ और द्रुत तीन ताल में ‘सांची कहै हौं’ प्रस्तुत करते हुए मंत्रमुग्ध किया था। फिर वर्ष 2017 में प्रयाग संगीत समिति के संगीत समारोह में शिरकत करने आए तो उन्होने तिहाई के सुंदर प्रयोग के साथ शुद्ध भैरवी में भजन ‘चलो मन वृंदावन की ओर’ सुनाकर न सिर्फ सभी को भावविभोर किया बल्कि अपना वायदा भी निभाया। राग नंद में विलंबित ख्याल की रचना अद्भुत रही।

विनम्रता ऐसी कि ‘अमर उजाला’ से मुलाकात में कहा था, किसी भी कलाकार के लिए पुरस्कार-सम्मान उसके चाहने वाले होते हैं। ऐसे श्रोताओं और प्रशंसकों का मिलना किसी भी पुरस्कार-सम्मान से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। मेरे लिए मेरे श्रोता ही सबसे बड़ा सम्मान हैं। कोशिश हो कि श्रोताओं का सच्चा प्यार बना रहे। कला पर भरोसा ऐसा कि कहते थे, संगीत के प्रति सच्ची लगन हो तो आजीविका का संकट नहीं है। दुनिया भर में भारत की पहचान अर्थव्यवस्था नहीं इसकी अद्भुत संस्कृति से ही है, इसे संजोना और बढ़ाना ही होगा।

यादें-मुलाकातें

वह बहुत बड़े कलाकार थे। उनका जाना संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। यह मेरे लिए सुखद रहा कि मेरे कार्यकाल में वर्ष 2013 में हुए तानसेन समारोह में उन्हें ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा गया था। उन्होंने प्रयागराज में भी कई शिष्य बनाए।
0 प्रो.स्वतंत्रबाला शर्मा, पूर्व कुलपति, राजा मानसिंह तोमर विवि

रागों को देखने की उनकी दृष्टि अद्भुत थी। वह थोड़ी ही देर में अध्यात्म से जुड़ जाते थे। बीते महाकुंभ में आए तो कार्यक्रम के अगले दिन दो बजे की फ्लाइट थी। इस बीच युवाओं संग बैठकर बतियाते, उन्हें चुटकुले सुनाते रहे। लेकिन, उनकी बातों में गजब के गूढ़ अर्थ होते थे।
0 डॉ.मधु शुक्ला, स्टेट कोआर्डिनेटर, स्पिक मैके
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