{"_id":"69f516b99421d62a1b07b529","slug":"circumstantial-evidence-is-not-weakened-by-witnesses-turning-hostile-high-court-allahabad-news-c-3-ald1024-875964-2026-05-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"गवाहों के मुकरने से कमजोर नहीं होते परिस्थितिजन्य साक्ष्य : हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गवाहों के मुकरने से कमजोर नहीं होते परिस्थितिजन्य साक्ष्य : हाईकोर्ट
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के करीब 43 साल पुराने मामले में दोषी की सजा को बरकरार रखते हुए अतिरिक्त जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गवाहों के मुकरने से परिस्थितिजन्य साक्ष्य कमजोर नहीं होते। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने कानपुर देहात के लल्लू की अपील खारिज कर दी।
मामला कानपुर देहात के बिल्हौर थाना क्षेत्र का है। 1982 में छोटेलाल की हत्या कर दी गई थी जबकि शांति देवी घायल हुई थीं। ट्रायल कोर्ट ने 1983 में सुनवाई के बाद आरोपी को गैरइरादन हत्या का दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मामले के मुख्य गवाह, जिनमें मृतक के करीबी और घटना के समय मौजूद लोग शामिल थे, बाद में अपने बयान से मुकर गए थे। हालांकि, कोर्ट ने गवाहों के बयान, घटनास्थल से जुड़े प्रमाण और आरोपी के घटना के बाद के आचरण को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि कुछ गवाहों ने आरोपी को घटना के तुरंत बाद खून से सने हथियार के साथ मौके से भागते हुए देखा था, जो उसके अपराध में शामिल होने की मजबूत कड़ी है।
विज्ञापन
लिहाजा, कोर्ट ने यह भी माना कि एफआईआर समय पर दर्ज की गई थी और उसमें घटना का स्पष्ट उल्लेख था, जो बाद में सामने आए साक्ष्यों से मेल खाता है। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी यह सिद्ध किया कि मृतक को गंभीर चोटें पहुंचाई गई थीं, जो धारदार हथियार से संभव थीं।
कोर्ट ने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दोष सिद्ध करने में कोई गलती नहीं की, लेकिन सजा निर्धारित करते समय कुछ कानूनी पहलुओं की अनदेखी की गई। विशेष रूप से, जानलेवा हमले के अपराध के लिए जुर्माना न लगाना त्रुटि थी, क्योंकि इस धारा के तहत सजा के साथ जुर्माना भी आवश्यक माना जाता है। लिहाजा, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए आरोपी पर 10,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया। साथ ही स्पष्ट किया कि यदि आरोपी जुर्माना अदा नहीं करता है, तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी।
विज्ञापन
मामला कानपुर देहात के बिल्हौर थाना क्षेत्र का है। 1982 में छोटेलाल की हत्या कर दी गई थी जबकि शांति देवी घायल हुई थीं। ट्रायल कोर्ट ने 1983 में सुनवाई के बाद आरोपी को गैरइरादन हत्या का दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। सभी सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था। इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
विज्ञापन
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मामले के मुख्य गवाह, जिनमें मृतक के करीबी और घटना के समय मौजूद लोग शामिल थे, बाद में अपने बयान से मुकर गए थे। हालांकि, कोर्ट ने गवाहों के बयान, घटनास्थल से जुड़े प्रमाण और आरोपी के घटना के बाद के आचरण को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि कुछ गवाहों ने आरोपी को घटना के तुरंत बाद खून से सने हथियार के साथ मौके से भागते हुए देखा था, जो उसके अपराध में शामिल होने की मजबूत कड़ी है।
विज्ञापन
लिहाजा, कोर्ट ने यह भी माना कि एफआईआर समय पर दर्ज की गई थी और उसमें घटना का स्पष्ट उल्लेख था, जो बाद में सामने आए साक्ष्यों से मेल खाता है। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी यह सिद्ध किया कि मृतक को गंभीर चोटें पहुंचाई गई थीं, जो धारदार हथियार से संभव थीं।
कोर्ट ने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने दोष सिद्ध करने में कोई गलती नहीं की, लेकिन सजा निर्धारित करते समय कुछ कानूनी पहलुओं की अनदेखी की गई। विशेष रूप से, जानलेवा हमले के अपराध के लिए जुर्माना न लगाना त्रुटि थी, क्योंकि इस धारा के तहत सजा के साथ जुर्माना भी आवश्यक माना जाता है। लिहाजा, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए आरोपी पर 10,000 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया। साथ ही स्पष्ट किया कि यदि आरोपी जुर्माना अदा नहीं करता है, तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त कारावास की सजा भुगतनी होगी।