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High Court : मायके से आर्थिक मदद मिलने पर भी भरण-पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते

Mon, 29 Jun 2026 04:14 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 29 Jun 2026 04:14 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को उसके माता-पिता आर्थिक सहायता दे रहे हैं तो इसे उसकी आय नहीं मानी जा सकती है।

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Cannot evade maintenance liability even if financial support is received from maternal home.
अदालत का आदेश - फोटो : istock

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को उसके माता-पिता आर्थिक सहायता दे रहे हैं तो इसे उसकी आय नहीं मानी जा सकती है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने बुलंदशहर के परिवार न्यायालय का आदेश आंशिक रूप से निरस्त कर पत्नी और दो नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण में वृद्धि कर दी।

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याची की शादी 2007 में पंकज के साथ हुई थी। दंपती के दो पुत्र हैं। पत्नी का आरोप था कि विवाह के बाद उसे प्रताड़ित किया गया। जनवरी 2020 में उसे दोनों बच्चों सहित घर से निकाल दिया। इसके बाद वह अपने मायके में रहने लगी। उसने भरण-पोषण के लिए परिवार न्यायालय में वाद दायर किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसे याची पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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पत्नी ने कोर्ट को बताया कि उसकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह माता-पिता पर निर्भर है। वहीं, पति ने दावा किया कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के घर छोड़कर चली गई थी। वह सेना से सेवानिवृत्त होकर लगभग 21 हजार रुपये मासिक पेंशन प्राप्त कर रहा है। वहीं, पत्नी को अपने माता-पिता से आर्थिक सहायत मिलती है। हाईकोर्ट ने कहा कि पति का यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पत्नी पिता की कृषि एवं डेयरी कार्य में सहायता करती है। इसलिए वह स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है। कोर्ट ने पत्नी के लिए पांच हजार रुपये प्रतिमाह व दोनों बच्चों के लिए चार-चार हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण निर्धारित किया। यह राशि दो फरवरी 2021 यानी आवेदन दाखिल होने की तिथि से देय होगी। 

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