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अकारण नहीं खारिज कर सकते अनुकंपा नियुक्ति का दावा
Sat, 11 Jan 2020 09:36 PM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 11 Jan 2020 09:36 PM IST
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : डेमो
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई भी प्राधिकारी (प्रशासनिक अथवा अर्द्धन्यायिक) किसी प्रत्यावेदन को बिना कारण बताए निरस्त नहीं कर सकता है। प्रत्यावेदन अस्वीकार किए जाने का कारण बताना जरूरी है। कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए दिए गए आवेदन को बिना कारण बताए निरस्त करने का आदेश रद्द करते हुए सरकार को नए सिरे से प्रत्यावेदन पर नियमानुसार निर्णय लेने के लिए कहा है। गुरु चरण सिंह की याचिका पर न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने सुनवाई की।
याची का कहना था कि उसके पिता स्व. ज्ञान सिंह वाणिज्य कर विभाग में चतुर्थश्रेणी कर्मचारी थे। उनके निधन के बाद उसकी माता ज्ञानवती देवी को अनुकंपा नियुक्ति दी गई। ज्ञानवती देवी की भी सेवाकाल में ही मृत्यु हो गई। उस समय याची मात्र सात वर्ष का था। बालिग होने पर उसने अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन किया। उसका आवेदन पांच वर्ष की समयावधि से अधिक होने के कारण निर्णय हेतु शासन को भेज दिया गया। शासन ने बिना कोई कारण दिए प्रत्यावेदन निरस्त कर दिया। इसे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई।
याची के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे का कहना था कि विलंब को नजरअंदाज कर याची को अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए, क्योंकि उसकी मां के मृत्यु के समय वह नाबालिग था। कोर्ट ने कहा कि 17 जनवरी 2019 का आदेश देखने से स्पष्ट है कि इसे निरस्त करने का कोई कारण नहीं बताया गया है। कोई भी प्रत्यावेदन बिना कोई कारण बताए निरस्त नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने 17 जनवरी के आदेश को रद्द करते हुए प्रदेश सरकार को नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति पर दो माह में निर्णय लेने का आदेश दिया है।
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याची का कहना था कि उसके पिता स्व. ज्ञान सिंह वाणिज्य कर विभाग में चतुर्थश्रेणी कर्मचारी थे। उनके निधन के बाद उसकी माता ज्ञानवती देवी को अनुकंपा नियुक्ति दी गई। ज्ञानवती देवी की भी सेवाकाल में ही मृत्यु हो गई। उस समय याची मात्र सात वर्ष का था। बालिग होने पर उसने अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन किया। उसका आवेदन पांच वर्ष की समयावधि से अधिक होने के कारण निर्णय हेतु शासन को भेज दिया गया। शासन ने बिना कोई कारण दिए प्रत्यावेदन निरस्त कर दिया। इसे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी गई।
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याची के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे का कहना था कि विलंब को नजरअंदाज कर याची को अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए, क्योंकि उसकी मां के मृत्यु के समय वह नाबालिग था। कोर्ट ने कहा कि 17 जनवरी 2019 का आदेश देखने से स्पष्ट है कि इसे निरस्त करने का कोई कारण नहीं बताया गया है। कोई भी प्रत्यावेदन बिना कोई कारण बताए निरस्त नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने 17 जनवरी के आदेश को रद्द करते हुए प्रदेश सरकार को नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति पर दो माह में निर्णय लेने का आदेश दिया है।
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