हाईकोर्ट ने कहा : क्रूरतम अपराध समझौते के आधार पर नहीं हो सकते रद्द, याचिका को किया खारिज
कोर्ट ने कहा शादी के बाद 50 हजार नकद, कार आदि की मांग पूरी न करने पर पति ने परिवार के साथ मिलकर पीड़िता को मारापीटा। पति ने चाकू या ब्लेड और संबल से निजी अंगों में चोट पहुंचाई। रात भर खून बहा ,सुबह तक इलाज नहीं कराया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि क्रूरतम अपराधों को पारिवारिक समझौते के आधार पर अदालत रद्द नहीं कर सकती। कोर्ट ने पति- पत्नी व परिवार के बीच सुलह, साथ जीवन यापन करने के आधार पर आपराधिक केस रद्द करने की मांग में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह ने परशुराम व पांच अन्य ससुरालियों की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
कोर्ट ने कहा शादी के बाद 50 हजार नकद, कार आदि की मांग पूरी न करने पर पति ने परिवार के साथ मिलकर पीड़िता को मारापीटा। पति ने चाकू या ब्लेड और संबल से निजी अंगों में चोट पहुंचाई। रात भर खून बहा ,सुबह तक इलाज नहीं कराया।
पुलिस ने चार्जशीट दायर की। कोर्ट ने आरोप निर्मित किए। ट्रायल आखिरी स्तर पर है। पीड़िता के कोर्ट में दिए बयान ने अभियोजन पक्ष का समर्थन किया। कोर्ट ने इसे स्ट्रीम क्रूरता व बर्बरतापूर्ण अनैतिक कृत्य माना। कोर्ट ने कहा कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल न्याय की रक्षा में व न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकने के लिए करती है। अपराध की प्रकृति पर ही विचार कर समझौते के आधार पर केस रद किया जा सकता है, अन्यथा नहीं।