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बेलौस बहस करते, बेधड़क बोलते थे...
डॉ.सूर्यनारायण
Updated Sun, 24 Jul 2016 02:23 AM IST
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नीलाभ अश्क
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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पहले अपने इलाहाबाद आवास पर ज्यादातर दोपहर से नीलाभ जी साहित्यिक चर्चा करते हुए मिल जाते थे। बेलौस बहस करते और बेधड़क बोलते थे। किसी का अपमान नहीं करते थे। वह जल्दी किसी से सहमत भी नहीं होते थे, हालांकि दूसरो को असहमत होने की छूट देते थे और उनसे असहमति का कभी बुरा भी नहीं मानते थे। ये उनके व्यक्तित्व की खास विशेषता थी। निडर भी थे। सीमा आजाद से कचहरी में पेशी के दौरान मिलने भी जाते थे। वह भी तब जब सीमा को माओवादी होने के आरोप में गिरफ्तार कर नैनी जेल में रखा गया था। 1993 में बाबरी विध्वंस का मामला गरमाया था। 26 जनवरी को इविवि छात्रसंघ भवन पर अशोक सिंघल को झंडारोहण के लिए बुलाया गया था। छात्र उनका विरोध कर रहे थे। प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी समर्थन में थे। उस अभियान में नीलाभ आगे-आगे थे और गिरफ्तारी भी दी थी।
65 वर्ष में उनका प्रेम और विवाह करना काफी चर्चा में रहा, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों का डटकर सामना किया। वह जन संस्कृति मंच से जुड़े थे। यह तीनों वामपंथी लेखक संगठनों में सबसे क्रांतिकारी माना जाता था। युवावस्था में इसका असर उनपर भी था। ‘पूरा घर कविता’ महज उनकी एक किताब का शीर्षक ही नहीं उनकी जीवन-दृष्टि का बीज शब्द है। उन्होंने जिंदगी को पूरी जिंदादिली के साथ जिया। पहनने-ओढ़ने के बहुत शौकीन थे।
उनसे आखिरी मुलाकात पुस्तक मेले में जनवरी में हुई थी। डॉ.यास्मीन से परिचय कराया जो उनकी दोस्त थीं। उसके बाद अचानक एक दिन फेसबुक पर उन्होंने एक फोटो लगाई और विवरण में बताया कि वह महीनों से बीमार हैं। तमाम शुभकामनाओं के जवाब में विश्वास दिला रहे थे ‘मैं अभी मरूंगा नहीं। आप लोग चिंता न करें’। कभी न कुछ छिपाने वाले नीलाभ जी ने मित्रों से अपने गिरते स्वास्थ्य की खबर छिपाए रखी थी।
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0 सूर्यनारायण, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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65 वर्ष में उनका प्रेम और विवाह करना काफी चर्चा में रहा, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों का डटकर सामना किया। वह जन संस्कृति मंच से जुड़े थे। यह तीनों वामपंथी लेखक संगठनों में सबसे क्रांतिकारी माना जाता था। युवावस्था में इसका असर उनपर भी था। ‘पूरा घर कविता’ महज उनकी एक किताब का शीर्षक ही नहीं उनकी जीवन-दृष्टि का बीज शब्द है। उन्होंने जिंदगी को पूरी जिंदादिली के साथ जिया। पहनने-ओढ़ने के बहुत शौकीन थे।
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उनसे आखिरी मुलाकात पुस्तक मेले में जनवरी में हुई थी। डॉ.यास्मीन से परिचय कराया जो उनकी दोस्त थीं। उसके बाद अचानक एक दिन फेसबुक पर उन्होंने एक फोटो लगाई और विवरण में बताया कि वह महीनों से बीमार हैं। तमाम शुभकामनाओं के जवाब में विश्वास दिला रहे थे ‘मैं अभी मरूंगा नहीं। आप लोग चिंता न करें’। कभी न कुछ छिपाने वाले नीलाभ जी ने मित्रों से अपने गिरते स्वास्थ्य की खबर छिपाए रखी थी।
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0 सूर्यनारायण, इलाहाबाद विश्वविद्यालय