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High Court : क्लोरोफॉर्म सूंघा कर दुष्कर्म के आरोपी की जमानत मंजूर, कोर्ट ने कहा- आरोप काल्पनिक कहानियों जैसा

Sun, 28 Jul 2024 06:03 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 28 Jul 2024 06:03 PM IST
सार

न्यायमूर्ति पहल ने जेपी मोदी की मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस एंड टॉक्सिकोलॉजी का हवाला देते हुए कहा कि "जागते समय किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध उसे बेहोश करना असंभव है। इसलिए आरोपी जमानत का हकदार है। उसे जमानत पर रिहा किया जाए।

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Bail granted to the accused of rape by inhaling chloroform, the court said - the allegations are like imagina
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

संवाद न्यूज एजेंसी प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लोरोफॉर्म सुंघाकर महिला संग दुष्कर्म करने के आरोपी रविंद्र सिंह की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। कोर्ट चिकित्सा न्याय सिद्धांत का जिक्र करते हुए कहा कि क्लोरोफॉर्म सूंघा कर शारीरिक संबंध बनाने की कहानी भरोसे लायक नहीं लगती। यह आरोप काल्पनिक कहानी जैसी लगती है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकल पीठ ने आरोपी की जमानत अर्जी पर दिया है। कोर्ट ने कहा कि एक अनुभवहीन व्यक्ति के लिए बिना किसी व्यवधान के सो रही महिला को बेहोश कर देना बेहद असंभव है। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि "पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली कहानी जिसमें एक महिला के चेहरे पर क्लोरोफॉर्म में भिगोए गए रूमाल को रखकर उसे अचानक बेहोश कर दिया गया और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया, उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। "न्यायमूर्ति पहल ने जेपी मोदी की मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस एंड टॉक्सिकोलॉजी का हवाला देते हुए कहा कि "जागते समय किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध उसे बेहोश करना असंभव है। इसलिए आरोपी जमानत का हकदार है। उसे जमानत पर रिहा किया जाए।

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क्या था मामला
 

" मामल गौतम बुद्ध नगर के दादरी थाना क्षेत्र का है। आरोपी रविंद्र पर 2022 में झूठी शादी करने के बाद पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाने का आरोप है। बाद में पता चला कि उसने पिछली शादी से दो बच्चे होने की बात छिपाई थी। पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने क्लोरोफॉर्म का इस्तेमाल करके उसे बेहोश कर दिया और उसके नग्न वीडियो रिकॉर्ड करने के बाद उसे वायरल करने की धमकी देने लगा। पीड़िता की एफआईआर पर पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। रिहाई के लिए आरोपी ने पहले सत्र न्यायालय फिर हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाइकोर्ट ने आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए कहा कि आरोप सिद्ध होने तक व्यक्ति दोषी नहीं माना जा सकता। केवल आरोप के आधार पर उसके जीवन की स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता।

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