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हाईकोर्ट : सरकारी कार्यालय से रिकॉर्ड गायब होने के आधार पर नियुक्ति को अमान्य घोषित नहीं कर सकते

Fri, 25 Sep 2026 07:16 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 25 Sep 2026 07:16 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सरकारी कार्यालय से रिकॉर्ड या फाइल न मिलने के आधार पर किसी की नियुक्ति को अमान्य या फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने बिना पक्ष सुने वेतन रोकने के आदेश को रद्द कर दिया।

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Appointment cannot be declared invalid on the grounds of records going missing from a government office.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सरकारी कार्यालय से रिकॉर्ड या फाइल न मिलने के आधार पर किसी की नियुक्ति को अमान्य या फर्जी घोषित नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने बिना पक्ष सुने वेतन रोकने के आदेश को रद्द कर दिया।

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यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने मऊ के रजनीश उपाध्याय और 14 अन्य सहायक शिक्षकों की याचिका पर दिया है। याची शिक्षक समाज कल्याण विभाग से सहायता प्राप्त विद्यालयों में कार्यरत थे। इनकी नियुक्तियां 2010 से 2016 के दौरान नियमानुसार अनुमोदन प्राप्त कर की गई थीं। हालांकि, बाद में 2014 में जांच में बीएसए कार्यालय में अनुमोदन संबंधी दस्तावेज नहीं मिले तो विभाग ने जुलाई 2025 में नियुक्तियों को फर्जी बताकर वेतन रोकने और कानूनी कार्रवाई का आदेश जारी कर दिया। इसके खिलाफ शिक्षकों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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अधिवक्ता ने दलील दी कि 2018 में याचियों की नियुक्ति के संबंध में जांच की गई थी, जिसमें गड़बड़ी नहीं पाई गई थी। दर्ज एफआईआर में भी पुलिस ने एफआर लगा दी थी। बीएसए ने शिक्षकों का पक्ष सुने बिना नियुक्ति रद्द कर दी है। राज्य की ओर से कहा गया कि अनुमोदन को कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। इससे साबित होता है कि गलत तथ्य पेश कर अनुमोदन प्राप्त किया गया।
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कोर्ट ने पाया कि मामले में पूर्व में की गई जांच और पुलिस विवेचना में शिक्षकों को पहले ही क्लीनचिट मिल चुकी थी। इसके बावजूद न कोई नया साक्ष्य प्रस्तुत किया गया और न ही शिक्षकों को सुनवाई का मौका दिया गया। एक एकतरफा कार्रवाई कर दी गई। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना। कहा कि फाइलों के न मिलने के लिए सीधे तौर पर कर्मचारियों को दोषी ठहराना अनुचित है। कोर्ट ने अधिकारियों की ओर से जारी दंडात्मक आदेशों को निरस्त कर दिया। साथ ही आदेश दिया है कि यदि विभाग को पुनः कोई जांच करनी भी है तो वह निष्पक्ष तरीके से प्रत्येक शिक्षक का पक्ष सुनकर करे।

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