यूपी : निरस्त कानून के तहत दाखिल अपील सुनवाई योग्य नहीं, जिला जज का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शहरी भूमि सीमा कानून से जुड़े मामले में कहा कि शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) अधिनियम-1976 के निरस्त होने के बाद धारा-33 के तहत अपील दाखिल नहीं की जा सकती।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शहरी भूमि सीमा कानून से जुड़े मामले में कहा कि शहरी भूमि (सीमा एवं विनियमन) अधिनियम-1976 के निरस्त होने के बाद धारा-33 के तहत अपील दाखिल नहीं की जा सकती। यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने कानपुर विकास प्राधिकरण (केडीए) की तीन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए दिया। कोर्ट ने जिला जज, कानपुर के 24 दिसंबर 2024 के फैसलों और आदेशों को रद्द कर दिया।
सक्षम प्राधिकारी ने 1976 के कानून की धारा-8(4) के तहत तीन मामलों में क्रमशः 6632.61, 16676.46 और 9242.50 वर्गमीटर भूमि को अतिरिक्त खाली भूमि घोषित किया था। इसके बाद कानून के तहत आवश्यक अधिसूचनाएं और नोटिस जारी किए गए। दो मामलों में 1991 और तीसरे मामले में 1986 में भूमि का कब्जा ले लिया गया। बाद में भूमि केडीए को सौंप दी गई और राजस्व अभिलेखों में भी प्राधिकरण का नाम दर्ज हो गया। मूल भूमि धारकों ने कार्यवाही को चुनौती नहीं दी थी।
उत्तर प्रदेश में 18 मार्च 1999 को निरसन अधिनियम लागू होने के बाद भूमि धारकों के उत्तराधिकारियों ने 2009, 2011 और 2013 में जिला जज के यहां अपीलें दाखिल कीं। ये अपीलें वर्ष 1979, 1982 और 1983 में पारित आदेशों के खिलाफ थीं। जिला जज ने 24 दिसंबर 2024 को कहा था कि भूमि का वास्तविक कब्जा राज्य को हस्तांतरित होने का पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि निरसन अधिनियम की धारा-4 के तहत 1976 के कानून की धारा-33 में अपील का निहित अधिकार समाप्त हो गया था। निरसन अधिनियम कब्जा ली जा चुकी और नहीं ली गई भूमि के लिए अलग-अलग व्यवस्था करता है। जिन भूमि धारकों की जमीन का कब्जा नहीं लिया गया था, वे सामान्य कानून के तहत अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलें स्वतंत्र आधार पर भी सुनवाई योग्य नहीं थीं। भूमि का कब्जा लिए जाने के करीब 18, 20 और 27 वर्ष बाद अपीलें दाखिल की गईं, जबकि कानून में अपील के लिए केवल 30 दिन की समय सीमा निर्धारित थी। कोर्ट ने माना कि इतने लंबे समय तक चुप रहने और कार्यवाही को स्वीकार करने के बाद भूमि धारक अपील का अधिकार नहीं जता सकते। लिहाजा, कोर्ट ने जिला जज के फैसलों को निरसन अधिनियम के विपरीत और विरोधाभासी करार देते हुए तीनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।