आंबेडकर विवि की फर्जी बीएड डिग्री पर नौकरी कर रहे शिक्षकों की बर्खास्तगी पर मुहर
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खंडपीठ ने फर्जी मार्कशीट वाले अभ्यर्थियों के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, मगर जिनकी मार्कशीट में छेड़छाड़ की शिकायत है, उनकी जांच चार माह में कुलपति की निगरानी में करने का निर्देश दिया है। जांच पूरी होने तक यह अध्यापक काम करते रहेंगे और उनको वेतन भी मिलेगा। इनकी बर्खास्तगी का आदेश जांच के परिणाम पर निर्भर करेगा। कोर्ट ने कहा है कि जांच में देरी हुई तो संबंधित अध्यापक को वेतन पाने का हक नहीं होगा। जांच की अवधि भी नहीं बढे़गी। कोर्ट ने कहा है कि जांच के बाद यदि डिग्री सही पाई जाती है तो बर्खास्तगी वापस ली जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति एमएन भंडारी तथा न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने किरण लता सिंह सहित हजारों सहायक अध्यापकों की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए दिया है। अपील पर अपर महाधिवक्ता एम सी चतुर्वेदी, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय व स्थायी अधिवक्ता राजीव सिंह ने प्रदेश सरकार की तरफ से प्रतिवाद किया। अशोक खरे, आर के ओझा व एचएन सिंह ने अपीलार्थियों का पक्ष रखा, जबकि विश्वविद्यालय की तरफ से अशोक मेहता व बोर्ड की तरफ से जेएन मौर्य ने बहस की ।
न्यायमूर्ति शमशेरी ने हिंदी में लिखा फैसला
न्यायमूर्ति शमशेरी ने वरिष्ठ न्यायमूर्ति भंडारी के फैसले से सहमति जताते हुए अलग से हिंदी में फैसला दिया, जिसमें उन्होंने गुरु के महत्व को बताते हुए कहा कि शिक्षा एक पवित्र व्यवसाय है। यह जीविका का साधन मात्र नहीं है। राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कोई छल से शिक्षक बनता है तो ऐसी नियुक्ति शुरू से ही शून्य होगी। कोर्ट ने कहा कि छल कपट से शिक्षक बन इन्होंने न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया है, अपितु शिक्षक के सम्मान को ठेस पहुंचाई है।
यह था मामला
आगरा विश्वविद्यालय की 2005 की बीएड की फर्जी डिग्री के आधार पर हजारों लोगों ने सहायक अध्यापक की नियुक्ति प्राप्त कर ली। इन डिग्रियों की जांच कराने के लिए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई। हाईकोर्ट ने जांच का आदेश देते हुए एसआईटी गठित की, जिसने अपनी रिपोर्ट में व्यापक धांधली का खुलासा किया। सभी को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। 1814 लोगों ने जवाब दिया। शेष ने नोटिस का जवाब नहीं दिया। बीएसए ने फर्जी अंक पत्र व अंक पत्र से छेड़छाड़ की दो श्रेणियों वालों को बर्खास्त कर दिया। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने अंक पत्र में छेड़छाड़ करने के आरोपियों की विश्वविद्यालय को जांच करने का निर्देश दिया था और कहा था कि बर्खास्त अध्यापकों से अंतरिम आदेश से लिए गए वेतन की बीएसए वसूली कर सकता है। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश के इस अंश को रद्द कर दिया है।एसआईटी जांच के आधार पर बर्खास्तगी को दी चुनौती
टीचरों की इस विशेष अपील पर हफ्तों बहस के बाद कोर्ट ने फैसला 29 जनवरी को सुरक्षित किया था। एसआईटी की जांच रिपोर्ट से पता चला कि डिग्रियां और मार्कशीट फर्जी हैं। इन टीचरों को एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर बीएसए ने सेवा से बर्खास्त कर दिया था। एकल जज ने एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर इन टीचरों की बीएसए द्वारा की गई बर्खास्तगी को सही ठहराया था। एकल जज के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील में कहा गया कि बीएसए का बर्खास्तगी आदेश एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर पारित किया गया है, जो गलत है।कहा गया था कि पुलिस रिपोर्ट को टीचरों की बर्खास्तगी का आधार नहीं बनाया जा सकता है। बीएसए ने बर्खास्तगी से पूर्व सेवा नियमावली के कानून का पालन नहीं किया, जबकि सरकार की तरफ से बहस की गई कि इन टीचरों की बर्खास्तगी एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर की गई है। परंतु एसआईटी की रिपोर्ट हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में आई है। हाईकोर्ट ने इस मामले में जांच कर एसआईटी को रिपोर्ट देने को कहा था। बहस यह भी की गई थी कि फर्जी डिग्री या मार्कशीट के आधार पर सेवा में आने वालों की बर्खास्तगी के लिए सेवा नियमों का पालन करना जरूरी नहीं है।