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अमरकांत मध्यवर्गीय समाज के चितेरा हैं : कथाकार नलिन
Mon, 28 Jul 2025 01:56 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Mon, 28 Jul 2025 01:56 AM IST
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कथाकार अमरकांत की जन्मशती के तहत आयोजित दो दिवसीय शती स्मरण समारोह का रविवार को सीएमपी डिग्री कॉलेज के सभागार में समापन हुआ। वक्ताओं ने अमरकांत की कहानियों, उपन्यासों और पत्रकारिता के माध्यम से उनकी रचनात्मक सृजनात्मकता को याद किया।
वक्ता कथाकार नलिन रंजन सिंह ने कहा कि अमरकांत मध्यवर्गीय समाज के चितेरा हैं। उनके उपन्यासों के पात्रों में द्वंद्व है। कथाकार राकेश बिहारी ने कहा कि अमरकांत की कहानियों में यथार्थ का चित्रण है। कथानक का पारंपरिक तरीके से समीक्षा करने की जरूरत है। कथाकार मनोज पांडे ने कहा कि बहादुर कहानी में नौकर को मनुष्य नहीं समझा जाता, यहां तक कि क्रूर व्यवहार किया जाता है।
इसके बाद कथा लेखिका अनीता गोपेश ने कहा कि अमरकांत अपने पूरे रचनाकर्म और जीवन मूल्यों में एक प्रगतिशील कथाकार थे। मध्यवर्गीय जीवन और उसके चरित्रों की जितनी पकड़ अमरकांत की थी वैसा बहुत कम दिखता है। कथा लेखिका आभा त्रिपाठी ने कहा कि अमरकांत के साहित्य में यथार्थ के भीतर संघर्ष है।
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इविवि हिंदी विभाग के प्रो. प्रणय कृष्ण ने कहा कि अमरकांत के जन्मशती का शुभारंभ बलिया से किया गया था। आज के समय में स्मृति पर डंडे बरसाए जा रहे हैं। पाठ्यक्रमों में बदलाव की कोशिश को इन्हीं हथियारों से लड़ा जा रहा है। कथाकार वीरेंद्र यादव ने अमरकांत के पात्रों के माध्यम से जाति संरचना, स्त्री पुरुष मानसिकता और सामाजिक संरचना को व्यक्त किया। कमलानंद झा ने अमरकांत के उपन्यासों के शिल्प और भाषा पर प्रकाश डाला। प्रियदर्शन मालवीय ने कहानियों को रेखांकित किया।
गोपाल प्रधान ने कहा कि अमरकांत की राजनीतिक चेतना स्वाधीनता आंदोलन से निर्मित हुई। अमरकांत और हिंदी पत्रकारिता पर गोपाल रंजन, सुधांशु मालवीय, विवेक सत्यांशु, अरविंद बिंदु और धनंजय चोपड़ा ने विचार व्यक्त किए। स्वागत डॉ. सरोज सिंह, संचालन शिवानंद मिश्र, संध्या नवोदिता, हिमांशु रंजन ने किया। इस मौके पर प्रो. अर्चना खरे, प्रो. भावना चौहान, प्रो. दीनानाथ, डॉ. सूर्यनारायण, कुमार वीरेंद्र, डॉ. रामानुज यादव, डॉ. पूजा, डॉ. रंजीत सिंह, डॉ. आराधना मौजूद रहीं।
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वक्ता कथाकार नलिन रंजन सिंह ने कहा कि अमरकांत मध्यवर्गीय समाज के चितेरा हैं। उनके उपन्यासों के पात्रों में द्वंद्व है। कथाकार राकेश बिहारी ने कहा कि अमरकांत की कहानियों में यथार्थ का चित्रण है। कथानक का पारंपरिक तरीके से समीक्षा करने की जरूरत है। कथाकार मनोज पांडे ने कहा कि बहादुर कहानी में नौकर को मनुष्य नहीं समझा जाता, यहां तक कि क्रूर व्यवहार किया जाता है।
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इसके बाद कथा लेखिका अनीता गोपेश ने कहा कि अमरकांत अपने पूरे रचनाकर्म और जीवन मूल्यों में एक प्रगतिशील कथाकार थे। मध्यवर्गीय जीवन और उसके चरित्रों की जितनी पकड़ अमरकांत की थी वैसा बहुत कम दिखता है। कथा लेखिका आभा त्रिपाठी ने कहा कि अमरकांत के साहित्य में यथार्थ के भीतर संघर्ष है।
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इविवि हिंदी विभाग के प्रो. प्रणय कृष्ण ने कहा कि अमरकांत के जन्मशती का शुभारंभ बलिया से किया गया था। आज के समय में स्मृति पर डंडे बरसाए जा रहे हैं। पाठ्यक्रमों में बदलाव की कोशिश को इन्हीं हथियारों से लड़ा जा रहा है। कथाकार वीरेंद्र यादव ने अमरकांत के पात्रों के माध्यम से जाति संरचना, स्त्री पुरुष मानसिकता और सामाजिक संरचना को व्यक्त किया। कमलानंद झा ने अमरकांत के उपन्यासों के शिल्प और भाषा पर प्रकाश डाला। प्रियदर्शन मालवीय ने कहानियों को रेखांकित किया।
गोपाल प्रधान ने कहा कि अमरकांत की राजनीतिक चेतना स्वाधीनता आंदोलन से निर्मित हुई। अमरकांत और हिंदी पत्रकारिता पर गोपाल रंजन, सुधांशु मालवीय, विवेक सत्यांशु, अरविंद बिंदु और धनंजय चोपड़ा ने विचार व्यक्त किए। स्वागत डॉ. सरोज सिंह, संचालन शिवानंद मिश्र, संध्या नवोदिता, हिमांशु रंजन ने किया। इस मौके पर प्रो. अर्चना खरे, प्रो. भावना चौहान, प्रो. दीनानाथ, डॉ. सूर्यनारायण, कुमार वीरेंद्र, डॉ. रामानुज यादव, डॉ. पूजा, डॉ. रंजीत सिंह, डॉ. आराधना मौजूद रहीं।