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पहचान खो रहा इलाहाबादी अमरूद
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Allahabadi Amrood
50 प्रतिशत तक कम हो गया है बाग का रकबा, केला ने छिना रूतबा
उकठा रोग, कम आमदनी की वजह से किसानों का मोह हो रहा भंग
प्रयागराज। इलाहाबादी अमरूद अपनी पहचान खोता जा रहा है। एक दौर था जब विदेशों तक इसकी मांग थी लेकिन अब इसका दायरा सिमट रहा है। प्रयागराज और कौशाम्बी में अमरूद के बागों का रकबा 50 फीसदी तक कम हो गया है।
इलाहाबाद के साथ अमरूद के जुड़ाव को इससे ही समझा जा सकता है कि इसके स्वाद की मिठास साहित्य में शामिल रही। सफेदा और सूर्खा प्रजाति के अमरूद के बाग पूरे कौशाम्बी में फैले थे। प्रयागराज में कौड़िहार, सैदाबाद, धनुपुर के बड़े इलाके में अमरूद के बाग थे लेकिन अब इसके बाग उजड़ने लगे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इसकी मुख्य वजह उकठा रोग है। इस बीमारी की चपेट में आकर बाग के बाग उजड़ गए। इसके अलावा अधिक उत्पादन के लिए किसानाें ने नमक का उपयोग शुरू कर दिया। इसका भी नुकसान बागों को हुआ। इसके अलावा अमरूद से जेली, मुरब्बा आदि दूसरे उत्पाद बनाने के लिए प्रोसेसिंग यूनिटें भी स्थापित नहीं र्हुइं। इसकी वजह से अमरूद की खेती में फायदा नहीं रहा और किसान बाग लगाने से पीछे हटने लगे। मनौरी के किसान जावेद का कहना है कि अमरूद को ज्यादा दिन तक रखा भी नहीं जा सकता। खराब होने लगता है। इसलिए इसका बाजार सीमित है तथा उचित दाम भी नहीं मिलता। वहीं जिला उद्यान अधिकारी प्रतिभा पांडेय का कहना है कि उकठा बीमारी से अमरूद के बागों को बचाने के लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है। कई योजनाएं भी हैं लेकिन अमरूद के प्रति किसानों का रूझान कम हुआ है। कौशाम्बी के जिला उद्यान अधिकारी सुरेंद्र राम भाष्कर ने भी उकठा रोग को अमरूद की खेती के प्रति रूझान कम होने को मुख्य वजह बताया। खुशरोबाग के मुख्य उद्यान अधीक्षक केएम चौधरी का भी कहना है कि पहले की तुलना में अमरूद के पौधों की मांग कम हुई है। इसकी जगह आम और नीबू के पौधों की मांग बढ़ी है। अधीक्षक का यह भी कहना है कि अमरूद के बाजार, इसकी पैकैजिंग आदि पर ध्यान नहीं दिया गया। इससे भी इसकी मांग कम होती गई।
सरकार का केला पर जोर
सरकार का भी अमरूद के बजाय केला की खेती पर अधिक जोर है। इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि प्रयागराज में इस वर्ष 90 हेक्टेयर में टीश्यू कल्चर केला लगाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं अमरूद का लक्ष्य 20 हेक्टेयर है। कौशाम्बी में भी अमरूद का लक्ष्य 20 हेक्टेयर है। कौशाम्बी के उद्यान अधीक्षक इंद्रमणि यादव का कहना है कि अमरूद के बाग कम हुए हैं। इसके विपरीत केला में अधिक लाभ है। इसलिए केला का रकबा लगातार बढ़ रहा है।
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खुशरोबाग में रिसर्च बंद
खुशरोबाग इलाहाबादी अमरूद का केंद्र हुआ करता था। यहां रिसर्च सेंटर भी था लेकिन अब शोध का काम बंद हो गया है। रिसर्च का काम विश्वविद्यालयों के पास चला गया है। मुख्य अधीक्षक केएम चौधरी ने बताया कि खुशरोबाग में सिर्फ पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
एक जिला एक उत्पाद में अमरूद का चयन नहीं
प्रदेश सरकार की ओर से एक जिला एक उत्पाद योजना शुरू की गई। इसका मकसद स्थानीय विशेषताओं के आधार पर एक उत्पाद को चुनकर उसके व्यापार को बढ़ावा देना है। ताकि, स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाया जा सके। चौंकाने वाली बात यह रही प्रयागराज और कौशाम्बी दोनों जिलों में अमरूद के बजाय दूसरे उत्पादों को इस योजना के अंतर्गत चुना गया। प्रयागराज में मूज तथा कौशाम्बी में केला को चुना गया है।
सफेदा की जगह मध्य प्रदेश के वीएनआर प्रजाति को बढ़ावा
प्रयागराज के सफेदा और सूर्खा के बजाय मध्य प्रदेश के वीएनआर प्रजाति के अमरूद को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। खुशरोबाग के मुख्य अधीक्षक का कहना है कि इस प्रजाति के फल काफी बड़े होते हैं तथा दो से तीन गुना तक अधिक उत्पादन होता है। इसलिस महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में वीएनआर अमरूद का तेजी से विस्तार हो रहा है। अब यहां भी इसके विस्तार की योजना है।
अमरूद के बागों का रकबा (हेक्टेयर में)
जिला पूर्व में अब
प्रयागराज 1200 400
कौशाम्बी पांच हजार से अधिक 3000
केला के बागों का रकबा (हेक्टेयर में)
जिला पूर्व में अब
प्रयागराज -- 450
कौशाम्बी -- 5500
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उकठा रोग, कम आमदनी की वजह से किसानों का मोह हो रहा भंग
प्रयागराज। इलाहाबादी अमरूद अपनी पहचान खोता जा रहा है। एक दौर था जब विदेशों तक इसकी मांग थी लेकिन अब इसका दायरा सिमट रहा है। प्रयागराज और कौशाम्बी में अमरूद के बागों का रकबा 50 फीसदी तक कम हो गया है।
इलाहाबाद के साथ अमरूद के जुड़ाव को इससे ही समझा जा सकता है कि इसके स्वाद की मिठास साहित्य में शामिल रही। सफेदा और सूर्खा प्रजाति के अमरूद के बाग पूरे कौशाम्बी में फैले थे। प्रयागराज में कौड़िहार, सैदाबाद, धनुपुर के बड़े इलाके में अमरूद के बाग थे लेकिन अब इसके बाग उजड़ने लगे हैं। विशेषज्ञों की मानें तो इसकी मुख्य वजह उकठा रोग है। इस बीमारी की चपेट में आकर बाग के बाग उजड़ गए। इसके अलावा अधिक उत्पादन के लिए किसानाें ने नमक का उपयोग शुरू कर दिया। इसका भी नुकसान बागों को हुआ। इसके अलावा अमरूद से जेली, मुरब्बा आदि दूसरे उत्पाद बनाने के लिए प्रोसेसिंग यूनिटें भी स्थापित नहीं र्हुइं। इसकी वजह से अमरूद की खेती में फायदा नहीं रहा और किसान बाग लगाने से पीछे हटने लगे। मनौरी के किसान जावेद का कहना है कि अमरूद को ज्यादा दिन तक रखा भी नहीं जा सकता। खराब होने लगता है। इसलिए इसका बाजार सीमित है तथा उचित दाम भी नहीं मिलता। वहीं जिला उद्यान अधिकारी प्रतिभा पांडेय का कहना है कि उकठा बीमारी से अमरूद के बागों को बचाने के लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है। कई योजनाएं भी हैं लेकिन अमरूद के प्रति किसानों का रूझान कम हुआ है। कौशाम्बी के जिला उद्यान अधिकारी सुरेंद्र राम भाष्कर ने भी उकठा रोग को अमरूद की खेती के प्रति रूझान कम होने को मुख्य वजह बताया। खुशरोबाग के मुख्य उद्यान अधीक्षक केएम चौधरी का भी कहना है कि पहले की तुलना में अमरूद के पौधों की मांग कम हुई है। इसकी जगह आम और नीबू के पौधों की मांग बढ़ी है। अधीक्षक का यह भी कहना है कि अमरूद के बाजार, इसकी पैकैजिंग आदि पर ध्यान नहीं दिया गया। इससे भी इसकी मांग कम होती गई।
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सरकार का केला पर जोर
सरकार का भी अमरूद के बजाय केला की खेती पर अधिक जोर है। इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि प्रयागराज में इस वर्ष 90 हेक्टेयर में टीश्यू कल्चर केला लगाने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं अमरूद का लक्ष्य 20 हेक्टेयर है। कौशाम्बी में भी अमरूद का लक्ष्य 20 हेक्टेयर है। कौशाम्बी के उद्यान अधीक्षक इंद्रमणि यादव का कहना है कि अमरूद के बाग कम हुए हैं। इसके विपरीत केला में अधिक लाभ है। इसलिए केला का रकबा लगातार बढ़ रहा है।
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खुशरोबाग में रिसर्च बंद
खुशरोबाग इलाहाबादी अमरूद का केंद्र हुआ करता था। यहां रिसर्च सेंटर भी था लेकिन अब शोध का काम बंद हो गया है। रिसर्च का काम विश्वविद्यालयों के पास चला गया है। मुख्य अधीक्षक केएम चौधरी ने बताया कि खुशरोबाग में सिर्फ पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके अलावा किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
एक जिला एक उत्पाद में अमरूद का चयन नहीं
प्रदेश सरकार की ओर से एक जिला एक उत्पाद योजना शुरू की गई। इसका मकसद स्थानीय विशेषताओं के आधार पर एक उत्पाद को चुनकर उसके व्यापार को बढ़ावा देना है। ताकि, स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाया जा सके। चौंकाने वाली बात यह रही प्रयागराज और कौशाम्बी दोनों जिलों में अमरूद के बजाय दूसरे उत्पादों को इस योजना के अंतर्गत चुना गया। प्रयागराज में मूज तथा कौशाम्बी में केला को चुना गया है।
सफेदा की जगह मध्य प्रदेश के वीएनआर प्रजाति को बढ़ावा
प्रयागराज के सफेदा और सूर्खा के बजाय मध्य प्रदेश के वीएनआर प्रजाति के अमरूद को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। खुशरोबाग के मुख्य अधीक्षक का कहना है कि इस प्रजाति के फल काफी बड़े होते हैं तथा दो से तीन गुना तक अधिक उत्पादन होता है। इसलिस महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में वीएनआर अमरूद का तेजी से विस्तार हो रहा है। अब यहां भी इसके विस्तार की योजना है।
अमरूद के बागों का रकबा (हेक्टेयर में)
जिला पूर्व में अब
प्रयागराज 1200 400
कौशाम्बी पांच हजार से अधिक 3000
केला के बागों का रकबा (हेक्टेयर में)
जिला पूर्व में अब
प्रयागराज -- 450
कौशाम्बी -- 5500